सूर के प्रेम में रूप लिप्सा एवं साहचर्य है

सूर के प्रेम में रूप लिप्सा एवं साहचर्य है संयोग वर्णन की दृष्टि प्रकाश डालिए।

रसों में श्रृंगार रस प्रमुख है। इसे रसराज के नाम से अभिहित किया जाता है जिसका पूर्ण परिपाक सूर के काव्य में हुआ है। वात्सल्य के अनन्तर नवीनता, व्यापकता तथा रस की अनेक दिशाओं के चित्रण की दृष्टि से श्रृंगार का ही स्थान है। उसका विस्तार वात्सल्य से भी अधिक है। श्रृंगार रस के संयोग एवं विप्रलंभ दो पक्ष होते हैं। सूरदास ने श्रृंगार के दोनों प्रकार का ऐसी विदग्धता से वर्णन किया है कि पाठक का मन तन्मय होकर भावलोक में विचरने लगता है। आचार्यों ने श्रृंगारिक कथन के जितने अंग बताये हैं, सूरदास के काव्य में उनका पूर्णरूपेण समावेश है। “हिन्दी साहित्य में शृंगार का रसराजस्व यदि किसी ने पूर्ण रूप से दिखाया है तो वह सरदास जी ही हैं।”

सूर की उमड़ती हुई वाग्धारा उदाहरण रचने वाले रीतिकालीन कवियों के समान गिनार्य है, जिन हुए संचारियों से बंधकर चलने वाली न थी। यदि हम केवल सूर के विप्रलम्भ श्रृंगार तथा भ्रमरगीत को ही देख लें तो न जाने कितने प्रकार की मानसिक दशायें ऐसी मिलेगी, जिनका अभी नामकरण तक नहीं हुआ है। इसी को कवि की पहुँच या कल्पना कहा जाता है। ‘जहाँ न जाए रवि वहाँ जाय ‘कवि’ यह उक्ति यहाँ चरितार्थ होती है। सूरदास ने जीवन के परिमित क्षेत्र शृंगार व वात्सल्य पर ही अपनी लेखनी चलाई है, इन्हीं में उनकी पहुँच इतनी है जितनी अन्य किसी कवि की नहीं, तुलसीदास की भी नहीं। आचार्य वल्लभ के अनुयायी कृष्ण भक्त कवि भी इसी बात को लेकर चले। अतः प्रेम तत्व की पुष्टि में ही सूर की वाणी मुख्यतः प्रस्फुटित हुई।

श्रृंगार रस गोपियों एवं कृष्ण तथा राधा कृष्ण को लेकर अभिव्यक्त हुआ है। गोपियों एवं कृष्ण के प्रेम प्रसंग में अलौकिकता का भी समावेश हुआ है, परन्तु राधाकृष्णन अभिव्यक्त हुआ है। गोपियों एक से मानवी है, उसमें अलौकिकता को अधिक स्थान नहीं मिला। कृष्ण अभी बालक ही हैं। वे वृन्दावन में गोप-गोपियों के साथ गौचारण करते हैं, हँसते खेलते हैं, वृन्दावन में उसी हास-परिहास एवं सुखमय जीवन के बीच गोपियों के प्रेम का उदय होता है। गोपियाँ कृष्ण के दिन-प्रतिदिन खिलते हुए सौन्दर्य और मनोहर चेष्टाओं को देख मुग्ध होती चली जाती हैं, उनके मन में विकार उत्पन्न होने लगता है-

कृष्ण का अद्भुत सी और उनकी बाल को उन नियों के विकास को स्थायी दे है। भारी के प्रसंग से उनकी प्रेम भावना का विकास होता है। दान लीला घर लीला चीर हरण आदि के प्रसंगों में इसमें तीव्रता आती है। इस प्रेम संग का की पूर्णता राम लीला में प्रकट होती है। यहाँ तो मान कृष्ण व गोपियों में कोई

सूर के प्रेम की उत्पत्ति में रूप लिप्सा एवं साहचर्य दोनों का प्रयोग है। बाल क्रीड़ा के खा सखी आगे चलकर यौवन क्रीडा के सखा सखी हो जाते हैं।

इस प्रकार खेल-खेल में राधा कृष्ण के हृदय में प्रेमाकर पदा हो जाता है। इस आकर्षण के पश्चात् संयोग पक्ष के जितने भी क्रीड़ा विधान हो सकते हैं, सूर ने सभी लाकर एकत्र कर दिये हैं। पनघट प्रस्ताव, कुंज बिहार, यमुना स्नान, जलेकलि के समय पीठ मर्दन, गोदोहन के समय कृष्ण का राधा के मुख पर दूध के छींटे फेंकना, भरे आँगन में संकेत द्वारा वार्तालाप करना, घर के पीछे खिरक में तथा वन में खेलना, हिंडोले पर झूलना, रास, नृत्य आदि न जाने संयोग के कितने प्रसंग सूर ने लिखे हैं। एक प्रसंग की मार्मिकता दृष्टव्य है- आँगन में माता पिता, स्वजन, पारिवारिक बन्धु आदि सव विद्यमान हैं। लोक, लज्जा, और वैद मार्यादा से प्रतिहार द्वारपाल भी पहरा दे रहे हैं। राधा कहती है-

चितवन ही उर पैठि ने म जानी थीं कहा करयौ । सूर का संयोग क्षणिक घटना नहीं, तमय जीवन की एक गहरी चलती हुई धारा है, जिसमें अवगाहन करने वाले को दिव्य माधुर्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखाई देता है। धेनु दहत अति ही रति बाढ़ी।

सुन, री सखि जदपि नन्दनन्दन नाना ति नयावति । यह तो हुई संयोग पक्ष की बात वियोग पक्ष के अन्तर्गत भी सूर ने अनेक दशाओं का वर्णन किया है। उद्धव के ब्रज में आने से पूर्व वियोग चित्रण में विरह की एकादश दशाओं का चित्रण हुआ है। बाद के प्रसंग (भ्रमरगीत) में तो प्रेम की अनन्य तन्मयता ही सर्वत्र प्रतिध्वनित होती है। जितनी निपुणता एवं रसिकता के साथ सूर ने संयोग श्रृंगार का वर्णन किया है, उतनी ही दक्षता एवं मानता के साथ विप्रलम्भ का भी। जो व्यापकता, विस्तार एवं गम्भीरता संयोग के अन्तर्गत आने वाली मनोदशा के चित्रण में है, वही वियोग वर्णन में भी पाई जाती है। विरह दग्ध गोपियों एवं राधा के साथ लतायें जल रही हैं, यमुना विरह ज्वर से काली पड़ गयी है, गाएँ कृष्ण विरह में क्षीण एवं कुशगात हो गई हैं और ब्रज की शस्यश्यामला भूमि सुनसान एवं वीरान हो रही है। सूर के हृदय का जो स्पन्दन वियोग वर्णन ‘में हुआ है, मानो समस्त विश्व उसमें योग दे रहा है। इस क्षेत्र में सूर की समता करने वाला कोई अन्य कवि नहीं दिखाई देखा।

सूर के प्रेम में रूप लिप्सा एवं साहचर्य है

घर जाने के लिए पैर नहीं बढते । नेत्र आगे न देख पीछे ही देखते हैं। जब मन ही कृष्ण के साथ चला गया तो नेत्र कैसे रह सकते हैं। गोपियों के लिए जो घर कृष्ण की उपस्थिति स्वर्ग का नन्दन बना हुआ था, वही कृष्ण के वियोग में उन्हें काटने दौड़ता है- अरी मोहि भवन भयानक लागे माई स्याम बिना ।

कृष्ण के चले जाने पर सायं प्रभात तो उसी प्रकार होते हैं पर ‘मदनगोपाल बिना तन की सबै बात बदली।’ ब्रज में पहले सायंकाल का जो दृश्य देखने में आता था, वह अब नहीं दिखाई देता, पर तन से उसकी ‘स्मृति’ नहीं जाती-

तब ये लता लगति अति सीतल अब भई विषम ज्वाल की पुंज।

एहि बिरियाँ ब ते ब्रज आवते। दूरहि ते बह बेन अधर धारे बारम्बार बजावते ।। आनन्द देने वाले पदार्थ भी वियोग में दुःख के दो पोषक होते हैं- बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजै।

गोपियाँ अपने इसी उजड़े और नीरस जीवन से मेल न खाने के कारण वृन्दावन हरे-भरे कुंजों को भी कोसती हैं-

मधुबन ! तुम कत रहत हरे? विरह वियोग स्याम सुन्दर के ठाड़े क्यों न जरे । इसी प्रकार कृष्ण के बिना काली रात उन्हें सर्पिणी-सी लगती है- पिया बिन साँपिन कारी रात

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