भारतीय इतिहास लेखन ने भारत में यूरोपियों के आगमन के साथ न केवल उपागम, उपचार और तकनीक में अपितु ऐतिहासिक साहित्य की मात्रा में भी प्रबल परिवर्तन को अनुभव किया। शायद कोई भी अन्य कालावधि या देश 18वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के दौरान ऐतिहासिक सामग्री की प्रचुरता पर भारत जैसी गर्वोक्ति नहीं कर सका। आधुनिक भारत के इतिहास के निर्माण में राजकीय अभिलेखों- विभिन्न स्तरों सरकारी अभिकरणों के दस्तावेज – को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है।
ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों ने 1600-1857 की कालावधि के दौरान व्यापार दशाओं का विस्तृत वर्णन प्रदान किया। यह सत्य है कि ब्रिटेन की वाणिज्यिक कंपनी ने हजारों मील दूर एक बड़े क्षेत्र पर अपनी राजनीतिक सर्वोच्चता स्थापित की, जिसके लिए एक प्रकार के प्रशासन की आवश्यकता थी, जो पूरी तरह कागजों पर था। प्रत्येक नीति लिखित में होती थी और प्रत्येक व्यवसाय एवं लेन-देन प्रेषण, परामर्श एवं कार्रवाई, गुप्त पत्रों एवं अन्य पत्राचार के माध्यम से होता था, जिसके परिणामस्वरूप

कल्पनातीत मात्रा में ऐतिहासिक सामग्री में वृद्धि हुई। राजकीय अभिलेख निदेशक मण्डल और बोर्ड ऑफ कंट्रोल से सम्बद्ध अभिलेखों के अतिरिक्त जिले से लेकर सर्वोच्च सत्ता तक प्रशासन के सभी स्तरों को शामिल करते थे। जब ब्रिटिश महारानी (क्राउन) ने प्रशासन (भारतीय) संभाला, तो इसने भी बड़ी मात्रा में विभिन्न तरीकों के राजकीय अभिलेख सुरक्षित रखे। इन अभिलेखों का परीक्षण करके, हम चरणवार प्रत्येक मुख्य घटना एवं विकास को समझ सकते हैं और नीति-निर्माताओं के मनोविज्ञान समेत निर्णयन की प्रक्रिया का अनुगमन कर सकते हैं।
इन अभिलेखों के अतिरिक्त, अन्य यूरोपियन ईस्ट इंडिया कंपनियों (पुर्तगाली, डच एवं फ्रांसिसी) के अभिलेख भी 17वीं और 18वीं शताब्दियों के इतिहास सृजन हेतु उपयोगी हैं। प्राथमिक तौर पर ये आर्थिक इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था के बारे में भी इनसे काफी कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
कई सारे समकालीन और अंशतः समकालीन जैसे वृतांत, जीवन साहित्य एवं यात्रा वृतांत भी हैं जिन्होंने हमें 18वीं एवं 19वीं शताब्दियों के पूर्वार्द्ध के इतिहास की रोचक एवं उपयोगी झलकी प्रदान की है। यद्यपि समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं ने 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अपनी उपस्थिति दर्ज की, तथापि उन्होंने 19वीं और 20वीं शताब्दियों में भारतीय समाज के लगभग सभी पहलुओं पर बेहद मूल्यवान सूचना प्रदान
की।
आधुनिक भारत के इतिहास के अन्य स्रोतों में मौखिक प्रमाण, सृजनात्मक साहित्य और पेंटिंग्स शामिल हैं। यद्यपि मौखिक स्रोतों की अपनी सीमा होती है, वे अन्य ऐतिहासिक सामग्री के पुष्टिकरण में तथा घटनाओं, व्यक्तियों एवं ऐतिहासिक घटनाक्रम को समझने में हमारी मदद करते हैं। सृजनात्मक साहित्य, विशेष रूप से स्वदेशी साहित्य के नए रूप जैसे उपन्यास, लघु कहानियां एवं कविताओं जिनका विकास पश्चिम के प्रभाव में हुआ, ने समकालीन सामाजिक वास्तविकताओं का विविध प्रतिबिम्ब प्रदान किया। चित्रकारी में नए पैटर्न, जो औपनिवेशिक काल के दौरान दिखाई दिया, ने उस समय के जीवन को समझने में मदद की। इस प्रकार इन स्रोतों में ऐतिहासिक अभिलेख एवं गैर-अभिलेखबद्ध स्रोत शामिल हैं।