विश्व की भाषाओं का वर्गीकरण किन किन आधारों पर किया सकता है?
गणना करने वाले भाषा वैज्ञानिकों ने संसार की भाषाओं की संख्या लगभग 2796 बतलायी है। इनका वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया जा सकता है-आदि।
1. धर्म के आधार पर-ईसाई भाषाएँ, हिन्दू भाषाएँ, मुसलमानी भाषाएँ आदि।
2. देश के आधार पर-रूसी भाषाएँ, चीनी भाषाएँ, भारतीय भाषाएँ, मिस्त्री भाषाएँ
3. काल के आधार पर- प्रागैतिहासिक भाषाएँ, प्राचीन भाषाएँ, मध्ययुगीन भाषाएँ, आधुनिक भाषाएँ आदि।
4. महाद्वीप के आधार पर- अफ्रीकी भाषाएँ, एशियाई भाषाएँ, अमेरिकी भाषाएँ, यूरोपीय भाषाएँ आदि।
5. प्रकृति के आधार पर- अयोगात्मक तथा योगात्मक भाषाएँ।
6. पारिवारिक या ऐतिहासिक वर्गीकरण- यूरोपीय परिवार की भाषाएँ, एकाक्षर परिवार की भाषाएँ, द्रविण परिवार की भाषाएँ, आदि।
7. प्रभाव के आधार पर- संस्कृत प्रभावित, फारसी प्रभावित आदि। उपरोक्त वर्गीकरणों में भाषा विकास की दृष्टि से प्रकृति मूलक वर्गीकरण पारिवारिक वर्गीकरण तथा प्रभाव के आधार पर वर्गीकरण ही महत्वपूर्ण है।
प्रभाव के आधार पर वर्गीकरण- भाषाओं का प्रभाव के आधार पर वर्गीकरण अभी आरम्भिक अवस्था में ही है। कोई दो भाषाएँ जो आकृतिमूलक और पारिवारिक दृष्टि से एक-दूसरे के समीप नहीं है, प्रभाव की दृष्टि से एक-दूसरे के समीप आ जाती हैं, और उनके तुलनात्मक अध्ययन किये जा सकते हैं। उदाहरणार्थ-पारिवारिक और आकृतिमूलक दृष्टि से तमिल और हिन्दी का कोई सम्बन्ध नहीं है। किन्तु दोनों ही संस्कृत से प्रभावित हैं। अतः ध्वनि और शब्द समूह की दृष्टि से उनमें बहुत कुछ समानता है।
आकृतिमूलक वर्गीकरण-वाक्य विज्ञान और रूप विज्ञान या वाक्य रचना एवं पद रचना पर आकृति मूलक वर्गीकरण आधारित है। वाक्य में शब्दों का पारस्परिक सम्बन्ध किस प्रकार प्रकट किया गया है तथा शब्द धातु प्रत्यय या उपसर्ग लगाकर किस प्रकार बनाये गये हैं, को दृष्टि में रखते हुए भाषाओं के वर्ग निश्चित किये जाते हैं। कुछ भाषाओं के वाक्य गठन में समानता होती है तथा मूल शब्द से रूप बनाने की प्रक्रिया में भी समान होती है। उनको एक वर्ग में रख लिये जात अट स्पष्ट है कि भाषाओं के अका लक वर्गीकरण का आधार सम्बन्ध तत्व या शैली है। इस वर्गीकरण को वाक्यमूलक या रूपात्मक वर्गीकरण भी कहते हैं।
आकृतिमूलक वर्गीकरण में वाक्य और उसके गठन की प्रधानता रहती है-आकृति या रचना की दृष्टि से वाक्य चार प्रकार के होते हैं समास प्रधान, व्यास प्रधान, प्रत्यय- प्रधान और विभक्ति-प्रधान। समास-प्रधान वाक्य-समास प्रधान वाक्य में उद्देश्य, विधेय, वाचक आदि शब्द मिलकर समास का रूप धारण कर लेते हैं। ऐसे वाक्यों का प्रयोग समास शब्द के समान ही होता है। उत्तरी अमेरीका तथा दक्षिणी अमरीका की भाषाएँ, समास प्रधान हैं। जैसे- नांधोलिनिन (उत्तरी अमरीका की चेरोकी भाषा का शब्द) से ‘हम लोगों के लिए नाव लाओ’ इतने बड़े वाक्य का अर्थ निकलता है। इसमें नानत (लाना) अमोखल (नाव), निम (हम) मिलकर एक सामासिक शब्द बन गया है।
व्यास प्रधान वाक्य-व्यास प्रधान वाक्य में सभी शब्द स्वतंत्र होते हैं, वाक्य के उद्देश्य, विधेय आदि का सम्बन्ध स्थान, निपात अथवा स्वर के द्वारा प्रकट किया जाता है। संज्ञा, क्रिया, विशेषण आदि का रूप एक-सा ही होता है। वाक्य में उनके स्थान से ही निश्चित होता है कि यह शब्द क्या है? सूडानी, चीनी, तिब्बती, अनामी, स्यामी, मलय आदि भाषाओं में वाक्य रचना इसी प्रकार होती है। चीनी भाषा व्यास प्रधान भाषा का सबसे अच्छा उदाहरण है। उदाहरणार्थ ‘मैं तुम्हें मारता हूँ’ का चीन’ भाषा में ‘न्तीतानी’ (न्ती+ता+नी) कहेंगे। ‘तुम मुझे मारते हो’ कहने के लिए इन्हीं शब्दों में उलट फेर करके ‘नीतान्गो’ (नी+ता नगो) कहेंगे।
प्रत्यय प्रधान वाक्य- प्रत्यय प्रधान वाक्य में प्रत्ययों की प्रधानता रहती है। व्याकरण के कारण, लिंग, वचन आदि सभी भेद प्रत्यय द्वारा ही सूचित किये जाते हैं। प्रत्यय लगाकर एक ही शब्द से कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। उदाहरणार्थ तुर्की भाषा में ‘एवं’ शब्द का अर्थ घर होता है। इसमें बहुवचन का प्रत्यय जोड़ देने पर ‘एलवेर’ (अनेक घर) हो जाता है। इसी में ‘मेरा’ वाचक जोड़ देने से एवलेरिम (मेरे घर) बन जाता है।
विभक्ति प्रधान वाक्य- विभक्ति प्रधान वाक्य शब्द का परस्पर सम्बन्ध (कारक, वचन, आदि का सम्बन्ध) विभक्तियों के द्वारा प्रकट किया जाता है। ऐसी विभक्ति प्रधान रचना संस्कृत और अरबी में बहुत मिलती है।
वाक्य की तरह शब्द भी चार प्रकार के होते हैं – कुछ शब्द एकाक्षर धातु के समान होते हैं। ये वाक्य में प्रयुक्त होने पर भी अव्यय ही रहते हैं। इस प्रकार के शब्द धातु कहलाते हैं। कुछ शब्दों की रचना में प्रकृति और प्रत्यय का योग स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इस प्रकार के शब्द प्रत्यय प्रधान कहलाते हैं। जिनमें प्रकृति और प्रत्यय का योग कठिनता से प्रतीत होता है। वे विभक्ति प्रधान कहलाते हैं। कुछ शब्द स्वयं ही समास-मय होते हैं। इन्हें समास या वाक्य शब्द कहते हैं।
उपरोक्त चार प्रकार के शब्द विकास की चार अवस्थाओं को प्रकट करते हैं। पहले शब्द धातु अवस्था में रहते हैं। फिर थोड़े समय में घिसकर वे प्रत्यय बन जाते हैं। वे अकेले वाचक न रहकर दूसरे के साथ में विशेष अर्थ को प्रकट करते हैं। इस अवस्था का अतिरेक विभक्ति को जन्म देता है। और समस्त शब्दों में मिलता है। यह अवस्था शब्द की पूर्णावस्था को पहुँच जाती है। उदाहरणार्थ – ‘राम’ धातु अवस्था ‘रामवत’ प्रत्ययावस्था ‘रामाय’ विभक्ति अवस्था तथा ‘अस्ति’ समासावस्था है। इसी प्रकार वाक्यों के विकास की भी चार अवस्थाएँ होती हैं। भाषा समासावस्था की प्रारम्भिक स्थिति में आगे बढ़कर प्रत्यय और विभक्ति की अवस्था से होती हुई व्यास प्रधान को जाती है। इस प्रकार चार प्रकार की शब्द रचना तथा वाक्य रचना के आधार पर संसार की भाषाओं का आकृतिमूलक वर्गीकरण किया जाता है। भाषा चक्र सदैव घूमता रहता है। भाषा की प्रकृति संहित से व्यवहित की ओर जाने की है। भाषा प्रारम्भ में जटिल समस्या और स्थूल रहती है किन्तु शनैः शनैः सरल, व्यस्त, सूक्ष्म और सुकुमार होती जाती है। किन्तु कुछ भाषाएँ अपनी परिस्थितियों के कारण अधिक विकास नहीं कर पाती। इसी प्रकार संसार की भाषाओं में विकास की दो अवस्थाएँ मिलती हैं- (1) संहिता (2) व्यवहित । इस दृष्टि से संसार की भाषाओं को संहित और व्यवहित दो वर्गी में विभक्त किया जा सकता है।
पारिवारिक, वंशानुकूल या ऐतिहासिक वर्गीकरण आकृतिमूलक या रूपात्मक वर्गीकरण में जहाँ भाषा की आकृति और रचना पर ध्यान रहता है, वहाँ पारिवारिक वर्गीकरण आकृति रचना तथा रूप के साथ में अर्थ तत्व पर ध्यान रहता है। एक परिवार के अन्तर्गत वे भाषाएँ ही स्थान ले पाती हैं, जिनमें आकृति के अतिरिक्त कई दृष्टि से अर्थ और ध्वनि की पुष्टि से साम्य होता है। एक परिवार की भाषाओं के शब्द समूह (शब्द और अर्थ), व्याकरण या रचना (सम्बन्ध तत्व) और ध्वनि में समानता होती है। एक परिवार में कई भाषाओं को रखने के लिए निम्नलिखित समानताएँ होनी चाहिए-
1. ध्वनि में समानता।
2. प्रमुखता मौलिक शब्द भंडार के संज्ञा, किया, सर्वनाम और संख्या वाचक शब्दों में और अर्थ की समानता।
3. वाक्य रचना में समानता ।
4. धातु या मूल शब्द में कुछ तत्व घटाकर या जोड़कर अन्य शब्दों के बनाने की प्रक्रिया में समानता।
अतः स्पष्ट होता है कि एक भाषा परिवार में उन्हीं भाषाओं का समावेश हो सकता है, जिनके विषय में पर्याप्त प्रमाण इस विषय का प्राप्त होता है कि वे किसी एक ही मूल भाषा से निकली हैं। पारिवारिक वर्गीकरण में भाषाओं की आकृति पर सामान्य रचना की समान रूपता पर ही दृष्टि नहीं रहती, अपितु यह भी देखा जाता है कि उन भाषाओं की उत्पत्ति या विकास कुछ समान मूल शब्दों से हुआ है।
विश्व की भाषाओं का वर्गीकरण किन किन आधारों पर किया सकता है इस प्रकार किया गया है
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