नाम गोपाल, जाति कुल गोपहि गोप गोपाल-उपासी।।
गिरिवरधारी, गोधनचारी, वृन्दावन अभिलासी।
राजा नन्द, जसोदा रानी, जलधि नदी जमुना सी।
प्रान हमारे परम मनोहर, कमल नयन सुखरासी।
सूरदास प्रभु कहीं कहा लौं, अष्ट महासिधि दासी ।।
प्रसंग
सच्चा प्रेम समान स्तर पर और समान व्यक्तियों में ही सम्भव होता है। ब्रज-बालाएँ कृष्ण को अपने ही समान मानती समझती हैं और इसी कारण उनसे सच्चा (निश्छल और अटल) प्रेम करती हैं। अपने इसी प्रेम-भाव का परिचय देते हुए कोई ब्रज-बाला (सभी का प्रतिनिधित्व करते हुए उद्धव से कहती है।
व्याख्या
हम (सब ब्रज-बालाएँ) तो राजा नन्द के मान की (वृन्दावन की निवासी हैं। हमारा नाम गोपाल (गो पालने वाली) है, जाति और कुल ‘गोप’ तथा हम गोपों के इष्ट गोपाल (श्रीकृष्ण) की उपासिका है। परे आराध्यदेव गोपाल कृष्ण पर्वत को (गोवर्धन) धारण करने वाले (अपनी अंगुली पर), गोधन को चराने वाले तथा वृन्दावन से प्रेम करने वाले हैं। हमारे राजा नन्द हैं और रानी यशोदा हैं। यमुना नदी ही हमारे लिए समुद्र (की भाँति) है। भाव यही है कि हम और हमारे इष्ट कृष्ण सरलमना और सामान्य समान स्तर के हैं, जिनमें परस्पर किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं है। इसी से हमारे प्राण प्रिय कृष्ण अत्यधिक मनोहर, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाले तथा सभी सुखों के आगार हैं। सूर प्रभु कृष्ण के विषय में और कहाँ तक कहूँ? सच तो यह है कि आठों महासिद्धियाँ भी उनकी दासी हैं (अथवा प्रभु कृष्ण प्रेम के समक्ष तो आठों महासिद्धियाँ भी नगण्य प्रतीत होती हैं)।
विशेष
- यहाँ पर गोपियों का सरल, सामान्य, निश्छल, अनन्य और समस्तरीय प्रेम-भाव विशेष रूप से दर्शनीय है।
- महासिद्धियाँ आठ हैं- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व तथा वशीत्व ।
- अलंकार (क) अनुप्रास – गोपहि गोधनचारी। (ख) उपमा – जलधि सी। (ग) अप्रस्तुतप्रशंसा – प्रान सुखरासी। (घ) अतिशयोक्ति – कही दासी। भावसाम्य ‘आठौ सिद्धि नवौं निधि को सुख, नन्द की गाय चराय
बिसारों।’ -रसखान
भाषा के अन्तर्गत शब्दों का सटीक प्रयोग कवि की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता होती है। यहाँ पर गोपाल, गोपहि, गोप, ग्वाल, गोधनचारी जैसे शब्द इसी सार्थक शब्द-योजना और लालित्य के प्रमाण हैं।
जीवन मुँहचाही को नीको ।
दरस परस दिन-रात करति हैं, कान्ह पियारे पी को।।
नयनन मून्दि मून्दि किन देखौ बंध्यों ज्ञान पोथी को।
आछे सुन्दर स्याम मनोहर और जगत सब फीको ।।
सुनौ जोग को का लै कीजै, यहाँ ज्यान है जी को।
खाटी मही नहि रुचि मानै, ‘सूर’ खवैया घी को।।
प्रसंग
सौतिया डाह। नारी के अटल प्रेम-भाव की एक बड़ी बाधा है- इसका कारण? नारी अपने प्रिय पर सम्पूर्ण एकाधिकार चाहती है।ब्रज की गोपियाँ भी ऐसी ही नारी हैं। फिर भी उनका प्रेम अनन्य और अटल है, योग और भोग कोई भी उसको कम नहीं कर पाता।अपने ऐसे ही कृष्ण प्रेप को अभिव्यक्त करते हुए और परोक्षतः योग-ज्ञान को अपने लिए निष्फल ठहराते हुए कोई ब्रज नारी उद्धव से कहती है कि
व्याख्या
जीवन तो केवल मुँह चढ़ी प्रिया (कुब्जा) का ही श्रेष्ठ है। वह दिन-रात प्रिय-प्रियतम कृष्ण के दर्शन और स्पर्शादि करती है, क्योंकि कृष्ण मथुरा में उसी के समीप हैं। हे उद्धव ! तुम्हारे द्वारा बताए-समझाए गए ब्रह्म और उसके ज्ञान को आँख बन्द करके किसको देखा जाए (एक तो आँख बन्द करके दिखेगा ही क्या और दूसरे ध्यान करने पर दिखे भी तो हमारे कृष्ण का ध्यान भंग हो जाएगा)। तुम्हारा ज्ञान तो केवल पोथियों में बंधा है अर्थात् केवल पुस्तकीय है, व्यावहारिक नहीं। है।
सच तो यह है कि (कृष्ण से प्रेम करने के कारण हमारे लिए तो सुन्दर और मनोहर कृष्ण ही अच्छे हैं, (उनके सामने तो) शेष समस्त जगत फीका या निस्सार है। तुम्हारे योग ज्ञान को सुनकर ही हम क्या ले लेंगे? कुछ नहीं। कारण? इसमें तो प्राण हानि तक का अवसर है (क्योंकि हठ योग में प्राणायाम आदि श्वास अवरोधक क्रियाओं को करने में तो श्वास ही रुक जाएगी और फलस्वरूप मृत्यु हो जाएगी)। इतना ही नहीं घी के खवैया को भला खट्टा क्या रुचिकर लगेगा? भाव यह है कि हमारे लिए तो कृष्ण का प्रेम पी की भाँति लाभप्रद है और तुम्हारा योग-ज्ञान खट्टे मछे की भाँति त्याज्य है।
यहाँ पर प्रथम दो पंक्तियों में नारी सुलभ सौतिया डाह, तीसरी पंक्ति में नारी-सुलभ व्यंग शक्ति, चौथी पंक्ति में प्रेम की अनन्यता और अन्तिम दो पंक्तियों में सरल सहज तर्कशक्ति मुखर होती हुई मिलती है। फलतः समस्त पद नारी-मनोविज्ञान का सच्चा परिचायक बन गया है। अलंकार (क) लोकोक्ति प्रथम और अन्तिम पंक्ति ! (ख) पुनरुक्ति मूदि
C
तरीय प्रेम-भाव
प्रकाम्य, ईशित्व
मूँदि। (ग) अनुप्रास-सुन्दर स्याम।
‘खाटी घी को एक सुन्दर स्थानीय लोकोक्ति है।