पाकिस्तानी इलाके वाले पंजाब हड़प्पा में कांस्य युग सहयोग की शहरी संस्कृति एक अग्रिम खोज की थी 1853 में एक महान उत्खननकर्ता और खोजी मिति इंजीनियर ए. कनिंघम का ध्यान एक हड़प्पा मुहर पर गई। हालाँकि मुहर पर एक बैल और छह अक्षर अंकित थे लेकिन वह इसके महत्व से अनभिज्ञ रहा। हड़प्पा स्थलों की क्षमता की पहचान बहुत बाद में सन् 1921 में की गई, जब भारतीय पुरातत्वविद् दया राम साहनी ने इसकी खुदाई शुरू की। उसी समय एक इतिहासकार आर.डी. बनर्जी ने सिन्ध में मुहनजो दड़ो स्थल की खुदाई की। दोनों ने मिलकर एक विकसित सभ्यता का सूचक माने जाने वाले मिट्टी के बर्तनों और अन्य प्राचीन वस्तुओं की खोज को सम्भव बनाया। सन् 1931 में मार्शल के सामान्य पर्यवेक्षण में बड़े पैमाने पर मुहनजो दड़ो की खुदाई की गई। सन् 1938 में मेके ने उसी जगह की खुदाई की। सन् 1940 में वत्स ने हड़प्पा में खुदाई की। सन् 1946 में मोर्तिमेर व्हीलर ने हड़प्पा में खुदाई की। स्वतन्त्रता पूर्व और विभाजन पूर्व काल में की गई खुदाई ने हड़प्पा संस्कृति के विभिन्न स्थलों की प्राचीन वस्तुओं को प्रकाश में लाया जहाँ काँसे का इस्तेमाल किया गया था।
स्वातन्त्र्योत्तर काल में भारत और पाकिस्तान

पुरातत्वविदों ने हड़प्पा और इससे जुड़े स्थलों की खुदाई की। सूरज भान, एम.के. धावलीकर, जे.पी. जोशी, बी.बी. लाल, एस.आर. राव, बी.के. थापर, आर.एस. बिष्ट और अन्य ने गुजरात, हरियाणा और राजस्थान में काम किया।
पाकिस्तान में एफ.ए. खान ने मध्य सिन्धु घाटी में कोट दिजी की खुदाई की और हकरा और पूर्व हकरा संस्कृतियों की तरफ एम.आर. मुगल ने काफी ध्यान दिया। ए.एच. दानी ने पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती प्रान्त में गान्धार की कब्रों की खुदाई की। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के पुरातत्वविदों ने भी हड़प्पा सहित कई स्थानों पर काम किया।
अब हमारे पास हड़प्पा पर्याप्त समृद्ध सामग्री है हालाँकि उत्खनन और खोज अभी भी प्रगति पर है। सभी विधान हड़प्पा संस्कृति के शहरीकरण के रूप में विकसित होने पर एकमत हैं, लेकिन हकरा-घग्घर नदी के साथ पहचानी गई सरस्वती की भूमिका और इस संस्कृति के निर्माण करने वाले लोगों के बारे में अलग-अलग राय है। इस अध्याय में इस पर आगे चलकर विचार किया जाएगा।
सिन्धु या हड़प्पा संस्कृति ताम्र-पाषाण
संस्कृतियों से पुरानी है। जिसका अवलोकन पहले ही हो चुका है लेकिन काँस्य का उपयोग करने वाली संस्कृति के रूप में यह बाद की तुलना में कहीं अधिक विकसित था। यह भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग में विकसित हुआ। इसे हड़प्पा कहा जाता है, क्योंकि यह सभ्यता पहली बार सन् 1921 में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित आधुनिक स्थल हड़प्पा में खोजी गई थी। सिन्ध के कई क्षेत्र पूर्व- हड़प्पा संस्कृति के मुख्य क्षेत्र बने। यह संस्कृति शहरी सभ्यता में विकसित और परिपक्व हुई, जिसका विकास सिन्ध और पंजाब में हुआ। इस परिपक्व हड़प्पा संस्कृति का मुख्य क्षेत्र सिन्ध और पंजाब में मुख्यतः सिन्धु घाटी में था। वहाँ से यह दक्षिण और पूर्व की ओर फैली। इस तरह हड़प्पा संस्कृति पंजाब, हरियाणा, सिन्ध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किनारे थी। यह उत्तर में शिवालिक से दक्षिण में अरब समुद्र तक और पश्चिम में बलूचिस्तान के मकरन तट से उत्तर-पूर्व में मेरठ तक फैला था। समुद्री किनारों ने एक त्रिभुज जैसे स्थान का गठन किया जो लगभग 12.966 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था। जो कि पाकिस्तान की तुलना में बड़ा क्षेत्र है और प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की तुलना में तो निश्चय ही बड़ा है। ई.पू. तीसरी और दूसरी सहस्राब्दि में दुनिया भर में कोई अन्य संस्कृति क्षेत्र हप्पा जितना व्यापक नहीं था।
पूरे उपमहाद्वीप में अभी तक लगभग 2800 हड़प्पा स्थलों की पहचान की गई है। वे हड़प्पा संस्कृति के शुरुआती चरण, विकसित अवस्था और अन्तिम चरणों से सम्बन्धित हैं। विकसित चरण के स्थलों में दो सबसे महत्वपूर्ण शहर थे। पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मुहनजो दड़ो (जिसका शाब्दिक अर्थ है मुर्दों का टीला) दोनों पाकिस्तानी हिस्से में है। वे 483 किलोमीटर दूर स्थित सिन्धु से जुड़े हुए थे। सिन्ध में मुहनजो दड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दूर एक तीसरा शहर चान्हु-दरो में और खम्भात की खाड़ी के सिरहाने गुजरात के लोथल में चौथा शहर है। पाँचवाँ शहर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा में है, जिसका मतलब है काली चूड़ियाँ । छठा शहर बनावली, हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। यहाँ कालीबंगा की तरह दो सांस्कृतिक चरण मिलते हैं, पूर्व हड़प्पा और हड़प्पा । ये हड़प्पा काल की मिट्टी की ईंटों से बने चबूतरे, सड़कों और नालियों के अवशेषों से सम्बन्धित स्वरूप को दर्शाते हैं। हड़प्पा संस्कृति का विकसित और समृद्ध स्तर इन सभी छह स्थलों पर देखने को मिलता है। सुतकजेण्डर (sutkagendor) और सुरकोतड़ा (surkotada) के तटीय शहरों में भी इसके प्रमाण दिखते हैं। इन शहरों की पहचान गढ़ से होती है। बाद में हड़प्पा काल के संकेत गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप के रंगपुर और रोजड़ी में मिलते
