रघुवीर सहाय का जीवन परिचय
रघुवीर सहाय का जन्म लखनऊ में 9 दिसंबर, 1929 को हुआ। उन्होंने वहीं से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया। उनका परिवार सामान्य मध्यमवर्गीय था, जिसमें सरकारी आर्यसमाजी और कांग्रेसी प्रभाव के लोग समन्वित रहे। पिता साहित्य के अध्यापक थे- उनकी सादगी से इन्हें बहुत प्रेरणा मिली। अपनी शिक्षा के बाद वे दिल्ली आ गये। सन् 1951-52 में ‘प्रतीक’ के सहायक संपादक बने। इसके अतिरिक्त हैदराबाद से प्रकाशित ‘कल्पना’ के सम्पादक मण्डल में भी रहे। सन् 1963 से 68 तक नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता और 79-82 तक ‘दिनमान’ के प्रधान संपादक रहे। संगीत तथा गिनी चुनी फिल्में देखने का उन्हें शौक रहा। रघुवीर सहाय का जीवन परिचय
और जानकारिया
नई कविता धारा के समर्थशाली कवियों में श्री रघुवीर सहाय बहुचर्चित हैं। वे अधुनातन कवियों के हस्ताक्षर हैं। उनकी नवीन उद्भावनाएँ, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद इत्यादि वादों से न बंधकर भी उन्होंने बहुत कुछ इस ओर लिखा है, वे सम्पादन कार्य भी करते हैं एवं सजग रचनाकारी भी।
रघुवीर सहाय की कविताएँ दूसरा सप्तक में 1951 में प्रकाशित हुई। इसके बाद वे निरन्तर लिखते रहे और प्रकाशित होते रहे। उनके संकलन सीढ़ियों पर धूप में (1960), आत्महत्या (1967), हँसी हँसी जल्दी हँसो (1975), लोग भूल गये हैं (1982), कुछ पत्ते, कुछ चिट्ठियाँ (1989) हैं। उन्होंने कहानियाँ भी लिखीं और रास्ता इधर से है, जो आदमी हम बना रहे हैं आदि उनके प्रमुख कहानी संकलन हैं। निबन्ध संकलनों में, लिखने
का कारण, ऊबे हुए सुखी, वे और नहीं जो मारे जायेंगे आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उन्होंने कुछ कृतियों के अनुवाद भी किये हैं।
रघुवीर सहाय बोलचाल और सम्प्रेषण को कविता की भाषा का मुख्य गुण मानते हैं। उनकी कविताओं में एक गहरी सामाजिक और राजनीतिक चेतना रही है। वे साहित्यकार के साथ पत्रकार भी थे और यही कारण है कि उनकी भाषा अत्यन्त सहज, पैनी और सम्प्रेषणीय रही है। कवि में राजनैतिक सन्दर्भों को काव्य-रचना में ढालने का अपार कौशल रहा है-किन्तु उनकी संवेदना बराबर बनी रहती है। मार्क्सवाद को सहज रूप से मानकर भी वे उसे कविता पर आरोपित करने के पक्ष में कभी नहीं रहे। आज के प्रजातन्त्र में आम आदमी की लाचारी को भी उन्होंने व्यक्त किया है। रघुवीर सहाय का रचनाकार किसी वाद से प्रभावित नहीं है-पर उसकी रचना में प्रगतिशीलता सदा मौजूद रहती है। रघुवीर सहाय का काव्य विकास निरन्तर संवेदना और वैचारिकता के द्वन्द्व को नकारता है। अशोक वाजपेयी ने कहा है कि रघुवीर सहाय उन कवियों में से हैं, जो मनुष्यों के सम्बन्धों को पैनी धारदार भाषा में लिख सकने की सार्थक
कोशिश करते हैं। उनकी कविता में विचार और संवेदना का पारंपरिक द्वैत व्यर्थ हो जाता है। रघुवीर सहाय की सारी निष्ठा मानवता के प्रति रही है। वे अपने समय और परिवेश के
प्रति निरन्तर जागरूक रहे हैं। अपने सम सापयिक सन्दर्भ के साथ उनकी कविताओं में जन-जीवन की झलक है। उनका अवसान अशी कुछ समय पूर्व ही सन् 1990 में हुआ। अपनी सहज सार्थक-यथार्थ और सम्प्रेषणाय अभिव्यक्ति के कारण नयी हिन्दी कविता में उनका विशिष्ट महत्व है। इस प्रकार का लेखा देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर इस group से जरुर जुड़े
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