माखनलाल चतुर्वेदी

माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन परिचय

माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन परिचय      

साहित्यकार व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को बाबई में नंदलाल चतुर्वेदी के यहाँ हुआ। माता का नाम सुन्दरबाई था। पिता नंदलाल शिक्षक थे। आपकी शिक्षा ग्रामीण वातावरण में ही हुई। 8 वर्ष की आयु में ही तुकबंदी कर कविता लिखना शुरू कर दी। 14 वर्ष की आयु में श्रीमती ग्यारसी बाई के साथ आपका विवाह हो गया। आप पर वैष्णवी संस्कार पड़े थे। 1905 में आप राजनीति में आये और कुछ क्रांतिकारी युवाओं के साथ श्री देवस्कर जी से मिले। क्रांतिकारी देवस्कर जी ने प्राथमिक ज्ञान दिया कि मृत्यु से कभी भय नहीं खाना चाहिए। यह भी बताया कि क्रांतिकारी तरूण युवाओं को अपने यश की भूख नहीं होनी चाहिए। माखनलाल चतुर्वेदी ने क्रांति की मशाल हाथ में लेकर पूरे क्षेत्र में अलख जगाने का काम प्रारंभ कर दिया। वे 1906 में कलकत्ता से वापस आ गये। आप मसन गाँव में थे तभी दो क्रांतिकारी आपसे टिमरनी में मिले। गांगुली जी ने एक पेटी दी, जिसमें पिस्तौल थी, उस पेटी को आपने अपने स्कूल के साथी श्री शालिगराम के यहाँ रख दी। क्रांतिकारियों को घर पर भोजन कराया। वे क्रांतिकारियों के हमदर्द साथी थे।

क्रांतिकारी आते रहे और उनसे मिलते रहे और वे उनके भोजन आदि की व्यवस्था करते रहे। खण्डवा में धनार्जन के लिये शिक्षक की नौकरी की और ट्यूशन भी करते रहे। शिक्षक जीवन में ही आप श्री माधवराव सप्रे के संपर्क में आये और उन्हें अपना गुरु माना। उनके साहित्यिक शिष्य बन गये। वे पुरुषोत्तम दास टंडन के संपर्क में आये। 1912 में सुबोध सिन्धु में शक्तिपूजा लेख लिखने पर पुलिस को राजद्रोह का सन्देह हुआ। 26 सितम्बर 1913 में आपने शिक्षक पद से त्याग पत्र दे दिया। 1915 तक आते-आते एक राष्ट्र प्रेमी साहित्यकार के साथ-साथ एक क्रांतिकारी के रूप में पहचाने जाने लगे। ‘प्रभा’ के संपादक के नाते आपका संपर्क श्री गणेशशंकर विद्यार्थी, श्री कामता प्रसाद गुरु, श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी, महात्मा गांधी, मुंशीराम, पं. विष्णुदत्त शुक्ला जैसी विभूतियों से हुआ।

नागपुर राजनैतिक परिषद में आपने राजनैतिक भाषण दिया, जिसमें डॉ. गंगाधर राव चिटनीस, मोरोपंत, अभ्यंकर, डॉ. चोलकर, विपिन कृष्ण बोस, डॉ. हरिसिंह गौर ने भाग लिया था और अध्यक्षता रायबहादुर विष्णुदत्त जी शुक्ल ने की थी। 1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में आप गये। वहाँ मैथिलीशरण गुप्त और बालकृष्ण शर्मा नवीन से आपका परिचय हुआ। लखनऊ से लौटने के बाद आप पत्रकारिता और साहित्यिक लेखों के माध्यम से जनसेवा व राष्ट्रीय चेतना का प्रचार-प्रसार करते रहे।

1918 में बीमारी की अवस्था में आपने महात्मा गांधी के सभापतित्व में होने वाले हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में आने वाले लेखों की लेख माला का सम्पादन किया। 1919 में वाइसराय की इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौन्सिल की सदस्यता से रौलेट एक्ट के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया, जिसके कारण खण्डवा की राजनैतिक परिषद में उनका अभिनन्दन किया गया। 1919 में ही गांधी जी का काशी में भाषण सुनकर सशस्त्र क्रांति का विचार त्याग कर गांधीजी को राजनीति में सहायता की। 1920 में कर्मवीर जबलपुर से निकालना प्रारंभ किया।

1920 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार हुए। 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने विरोध किया तो बिलासपुर में आप पर मुकदमा चलाया गया, इससे छत्तीसगढ़ में बड़ी जागृति हुई। 8 माह की सजा हुई। 1923 में झंडा सत्याग्रह में एक जत्थे का नेतृत्व किया। सत्याग्रह सफल हुआ। माखनलाल चतुर्वेदी जी की अध्यक्षता में आम सभा हुई, जिसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सत्याग्रह वापिस लेने की घोषणा की। 1938 में पूरे प्रांत में घूम-घूम कर राष्ट्रीयता की अलख जगाते रहे। 1939 में त्रिपुरा कांग्रेस में आपने युवाओं को सम्बोधित किया। आपने खण्डवा को अपना हेडक्वार्टर बनाया तथा होशंगाबाद क्षेत्र में समय-समय पर आकर सम्मेलन व सभाएँ आदि की। माखनलाल जी के साथ-साथ उनके भाई श्री रामदयाल चतुर्वेदी तथा श्री हरिप्रसाद चतुर्वेदी भी कांग्रेस के रचनात्मक कार्यों में विश्वास रखते थे। आप कट्टर गांधीवादी विचारधारा के थे। आपने अछूतोद्धार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।

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