समृद्ध पुरालेख स्रोत अब पाकिस्तान में अवस्थित हैं। इन अभिलेखों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण संग्रह लाहौर के वेस्ट पाकिस्तान रिकॉर्ड ऑफिस में हैं जिसमें, 1894 से पंजा के अभिलेखों के अतिरिक्त, (1804-1857) के दिल्ली रेजीडेंसी औरि विभिन्न एक अभिकरणों के अभिलेख शामिल हैं जिन्होंने समावेलन-पूर्व पंजाब में कार्य । पेशावर में स्थित अभिलेख कार्यालय में 1849-1900 में पेशावर के कमि पलेख और 1901 से उत्तर-पश्चिम सीमा के प्रांतों के अभिलेख उपलब्ध हैं। भलेख भारतीय उपमहाद्वीप के प्रादेशिक इतिहास के अध्ययन के लिए मूल्यवान है और भारत के अफगानिस्तान, ईरान और सीमावर्ती क्षेत्रों की जनजातियों के साथ संबंधों के बारे में भी उपयोगी सूचना प्रदान करते हैं।

जीवनी साहित्य, संस्मरण या यात्रा वृतांत जैसे समकालीन या अर्द्ध-समकालीन दस्तावेज एवं प्रमाण भी उपलब्ध हैं जो हमें 18वीं और 19वीं शताब्दियों के भारत के इतिहास की उपयोगी झलकी प्रदान करते हैं।
व्यक्तिगत अभिलेखों का महत्व
कई यात्री, व्यापारी, मिशनरी एवं सिविल सर्वेट, जो इन शताब्दियों के दौरान भारत आए, ने देश के विभिन्न हिस्सों पर अपने अनुभवों एवं प्रभावों की छाप छोड़ी। इन वृत्तांतों ने आधुनिक भारतीय इतिहास के अध्ययन हेतु बेहद उपयोगी स्रोत का कार्य किया है। इन लेखकों के समूह में पूर्वप्रथम मिशनरीज (ईसाई धर्म प्रचारक) आते हैं जिन्होंने स्थानीय निवासियों में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए भारत में अधिकाधिक मिशनरीज भेजने के लिए तथा अपने सम्बद्ध समाजों को प्रोत्साहित करने हेतु लेखन किया। कुछ सिविल सर्वेट्स ने भी इस सुसमाचार के (ईसाई धर्म का प्रचार) दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व भी किया। उदाहरणार्थ, सर जॉन शोर और चार्ल्स ग्रांट, दोनों ने बंगाल में लम्बी सेवाएं प्रदान कीं, ने ईसाई धर्म प्रचारकों (मिशनरीज) एवं उनकी गतिविधियों का पुरजोर समर्थन किया।
यात्रा वृतांत
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ कर्मचारियों के यात्रा वृतांत भी बेहद मूल्यवान हैं। जॉर्ज फोस्टर के यात्रा वृत्तांत, जिन्होंने 1783 में बंगाल, लखनऊ, श्रीनगर, नादौन, कश्मीर की यात्रा की और काबुल, कैस्पियन सागर एवं सेंट पीटर्सबर्ग होते हुए इंग्लैंड वापस गए, ने उत्तरी भारत की राजनीतिक दशाओं के बारे में जानकारी प्रदान की। बेंजामिन हेन के 1814 में प्रकाशित ‘सेवरल टूअर्स धू वेरियस पार्ट्स ऑफ द पेनिनसुला’ जर्नल ने उस समय के दौरान प्रायद्वीप के आर्थिक उत्पादों पर बेहतरीन जानकारी प्रदान की। 1831 में प्रकाशित जेम्स बर्स की भुज की चिकित्सकीय स्थलाकृति पर टिप्पणी और ‘विजिट टू द कोर्ट ऑफ सिंध’ के लेखन ने कच्छ के इतिहास पर जानकारी प्रदान की। एलेक्जेंडर बर्स का वृत्तांत, ‘ट्रेवल्स इन्टू बोखारा’ जो 1834 में तीन वॉल्यूम में प्रकाशित हुआ, भारत से काबुल की उसकी यात्रा का वर्णन है। इस यात्रा का राजनीतिक उद्देश्य यह पता लगाना था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सिंधु क्षेत्र किस प्रकार लाभदायक रहेगा। सी.जे.सी. डेविडसर का 1843 में प्रकाशित डायरी ऑफ द ट्रेवल्स एंड एडवेंचर्स इन अपर इंडिया भी बेहद उपयोगी कार्य है। जॉन बटलर द्वारा असम प्रांत (1855) में लिखा यात्रा वृतांत ट्रेवल्स एंड एडवेंचर्स राज्य की पहाड़ी जनजातियों की प्रयाओं, आदतों एवं समाज का वर्णन है। डब्ल्यू.एच. स्लीमैन की ‘जन थ्रू द किंगडम ऑफ अवध’ अवध की राजनीतिक और आर्थिक दशाओं को प्रतिबिम्बित करती है।
अंग्रेजों के अतिरिक्त अन्य यूरोपीय देशों के यात्रियों ने भी रोचक वृत्तांत प्रस्तुत किए हैं। इस श्रेणी में विक्टर जेकमोन्ट, कैप्टन लियोपोल्ड वॉन ऑरलिच, बरोन चार्ल्स हयूगल, जॉन मार्टिन हॉनिगबर्जर, विलियम मूरक्रॉफ्ट एवं जॉर्ज ट्रेबेक इत्यादि प्रमुख रूप से शामिल हैं।
