भाषा विज्ञान की अध्ययन पन्द्धतियाँ

भाषा वैज्ञानिकों ने भाषा विज्ञान की तीन प्रमुख अध्ययन पद्धतियों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है, जिनका संक्षपत विवरण नीचे लिखी पंक्तियों में प्रस्तुत किया जा रहा है।

1. समकालिक  अध्ययन पद्धरति-समकालिक भाषा-विज्ञान कीअध्ययन पद्धति को ‘सांकालिक’ और ‘स्थित्यात्मक’ अध्ययन पद्धति नामों से भी सम्बोधितकरते हैं। भाषा विज्ञान की ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति की तुलना में समकालिक अध्ययनपद्धति किसी भाषा विशेष के एक सामयिक रूप (काल विशेष के स्वरूप) का ही अध्यन प्रसतुत करती हुईं उसकी स्थिति का चिंत्र प्रस्तुत करती है। उदाहरणार्थ-‘हिन्दी का स्वरूंप क्या है?’ विषय समकालिक अध्ययन पद्धति क क्षेत्रान्तर्त आयेगा। भाषा विज्ञान की समकालिक अध्ययन पद्धति के निम्नवत उपभेद “हैं-

(अ) वणनात्मक अध्ययन पद्धति-जैसा कि पद्धति के नाम से अभिव्यंजित होता है इसमें विशेषतः भाषा के स्वरूप का वर्णन अथवा विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है। वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति के स्वरूप का सविस्तार प्रतिपादन ‘ग्लीसन’ महोदय की कृति  में किया गया है। वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति को व्याकरणिक अध्ययन पद्धति भी कह सकते हैं। वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति देशकाल सापेक्ष होती है और जीवन्त भाषा अथवा बोलियों का अध्ययन करती है। अतः यह पद्धति भाषा या बोली के वर्तमान प्रयुक्त रूप से सम्बन्धित रहती है। इस पद्धति से अध्ययन करने वाले अध्येता का भाषा विषयक यथावत गठन उसका (गठन का) विश्लेषणात्मक संरंचना। विधान मात्र प्रस्तुत करना एकमात्र लक्ष्य होता है और अध्ययन के लिये अध्यंता में वस्तुपरक दृष्टिकोण का होना अत्यावश्यक माना जाता है। ध्यान देने की बात है कि इसे लोगों ने तुलनात्मक भाषा विज्ञान का नाम भी दिया है। असंदिम्ध रूप से वर्णनात्मक पद्धति के प्रतिपादन का श्रेय अमेरिका। तथा उसके भाषा विज्ञानियों को है, परन्तु भाषा विज्ञान की इस वर्णनात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए आज से लगभग बारह-तेरह शतक पूर्व महर्षि पाणिनि अपनी अष्टाध्यायी में अपने युग की भाषा का वर्णनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर चुक थे जो कि भाषा विज्ञान की वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति का सर्वोंत्तम उदाहरण कही जा सकती है। इस तथ्य को महान पाश्चात्य भाषाविद ब्लूमफील्ड भी अपने  नामक ग्रंथं में स्बीकार कर चुके हैं। भाषा विज्ञान की यह अध्ययन पद्धति आज ‘स्वतंत् पद्धति’ क रूप में विकसित हो चुकी है।

(आ) सरचनात्मक  अध्ययन पद्धति- जैसा कि अध्ययन पद्धति क नाम से .स्पष्ट होता है, इस संरचनात्मक अध्ययन पद्धति में वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति की समग्र विशेषताएँ सन्निहित रहती हैं। . यह संरचना अध्ययन पद्धति भाषा विशेष की सम्पूरण सरचना  का विश्लेषण करक उसकी ‘ आन्तरिक गठन व्यवस्था को’ प्रस्तुतकरती है। भाषा विज्ञान की इस संरचनात्मक अध्ययन पद्धति कोरचनात्मक, गठनात्मक घटनात्मक एवं संघरनात्मक़” अध्ययन पद्धतियों क नामों से भी जाना माना जाता है। ‘हैरिस’ दय की पुस्तक में संरचनात्मक अध्ययन पद्धति का विशेष विस्तार से उल्लेख मिलता है। ध्यातव्य है कि कुछ विद्वानों ने इसे संरचनात्मक भाषा विज्ञान भी कहा है।

2. ऐतिहासिक  अध्ययन पद्धति- भाषा विज्ञान की समकालिक अध्ययन पद्धति के प्रतिकूल भाषा विज्ञान की ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति भाषा के विभिन्न कालों के स्वरूप का अध्ययन करती है। भाषा विशेष के पुराने रूपों से नये रूपों का विकास कैसे हुआ, एतद विषयक विकास प्रविधियों, विकास के कारणों, उनके परिणामों का विशद विवेचनात्मक विवरण प्रस्तुत करना ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति का लक्ष्य होता है। समकालिक अध्ययन पद्धतियों का काल क्रमानुसार श्रृंखलाबद्ध रूप प्रस्तुत करना ही ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोजन होता है। अतः कुछ भाषाविदों ने इसे ‘गत्यात्मक अथवा विकासात्मक’ अध्ययन पद्धति के नाम से भी सम्बोधित किया है। ‘वैदिक युग से लेकर संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश की अवस्था पार करते हुये आधुनिक भाषाओं का अर्थ, ध्वनि, पद, शब्द, वाक्य एवं लिपि की दृष्टि से कैसे विकास हुआ’ यह विषय ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति के क्षेत्र में आता है। भाषा स्वभाव से परिवर्तनशील तथा प्रकृति से विकासोन्मुख होती है, कालान्तर में यह परिवर्तनशीलता तथा विकासोन्मुखता विकास का एक सोपान बन जाती है और इन अनेक सोपानों का अध्ययन ही भाषा विज्ञान की ऐतिहासिक पद्धति की सामग्री है, अध्ययन सीमा है। इस दृष्टि से विचार करने पर समकालिक अध्ययन पद्धति ऐतिहासिक अध्ययन की एक अंग, अंश, भाग अथवा पूरक सी प्रतीत होती है और उसमें समाहित होती सी दिखती है। ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति द्विकालिक है और समकालिक अध्ययन पद्धति एक कालिका संक्षेप में ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति भाषा के ऐतिहासिक रूप पर दृष्टि रखती है, परन्तु समकालिक अध्ययन पद्धति भाग के वर्तमान रूप पर ही दृष्टि रखती है। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि कुछ विद्वानों ने इसे ऐतिहासिक भाषा विज्ञान कहकर पुकारा है।

3. तुलनात्मक  अध्ययन पद्धति भाषा विज्ञान की इस तुलनात्मक अध्ययन पद्धति में भिन्न अथवा अभिन्न परिवार की दो या दो से अधिक भाषाओं का अर्थविज्ञान, ध्वनि विज्ञान, रूप (पद) विज्ञान, शब्द विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा लिपि विज्ञान आदि की दृष्टियों से तुलना की जाती है, उनमें पाये जाने वाले साम्य तथा वैषम्य पर विचार किया जाता है। वर्णनात्मक अध्ययन पद्धति अथवा ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति किसी एक भाषा को अपने अध्ययन का आधार बनाती है, परन्तु तुलनात्मक अध्ययन पद्धति एकाधिक (अनेक) भाषाओं को अपने अध्ययन का आधार बनाती है। मूलतः भाषा विज्ञान का जन्म ही तुलनात्मक अध्ययन पद्धति से हुआ है। इतना ही नहीं, सन् 1925 ई. से पूर्व तक भाषा विज्ञान अपनी प्रवृत्ति एवं प्रकृति में ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक ही था। परिणामस्वरूप आज का भाषा विज्ञान उस समय तुलनात्मक भाषा विज्ञान  अथवा ऐतिहासिक भाषा विज्ञान  के नाम से ही सम्बोधित होता था। ध्यान रखना चाहिये कि क्षेत्र विस्तार की दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन पद्धति में अथवा भाषाओं के समकालिक और विकालिक अध्ययन भी आते हैं। कतिपय वैज्ञानिक इसे तुलनात्मक भाषा विज्ञान भी करते हैं।

4. प्रायोगिक  अध्ययन पद्धति- भाषा विज्ञान विषयक सैद्धांतिक उपलब्धियों को भाषा के प्रायोगिक पक्ष पर आरोपित करने का प्रयत्न किया जाता है, तभी प्रायोगिक अध्ययन पद्धति का प्रारम्भ हो जाता है। इसे कुछ भाषा विज्ञानविद व्यवहारिक अध्ययन पद्धति भी कहते हैं। भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धति की यह चौथी नवीनतम और महत्वपूर्ण अध्ययन पद्धति है जिसमें निम्नलिखित समस्याओं पर विचार किया जाता है-

(आ) प्रयुक्त पाठ्य पुस्तकों का विश्लेषण एवं नवीन पाठ्य पुस्तकों का निर्माण।

(इ) व्याकरण और उसके विविध रूपों पर विचार।

(ई) विविध प्रकार के उपयोगी कोश कैसे तैयार किये जायें?

(3) अनुवाद के विविध रूपों पर विचार कर उपयोगी रूप का निश्चय तथा अनुवाद कैसे करें?

(ऊ) टाइपराइटर एवं भाषा विषयक अन्य यंत्रों में ध्वनि आदि की व्यवस्था कैसे की जाय

(ए) मनुष्यों की श्रवण अथवा उच्चारण सम्बन्धी कमियों की कैसे सुधारा जाय?

इतना ही नहीं, छन्द विषयक ध्वनि वैज्ञानिक व्याख्या, काकुविधान की समीक्षा, साहित्य का कलापक्षीय विवेचन भी इस अध्ययन पद्धति के अन्तर्गत आते हैं। भाषा विज्ञान की इस नवीनतम अध्ययन पद्धति के परिणामस्वरूप काव्यालोचन तथा भाषा विज्ञान के मध्य की दूरी समाप्त हो रही है, ‘शैली विज्ञान’ दोनों (भाषा विज्ञान एवं काव्यालोचन) के समन्वय का साकार रूप है। जैसे निबंध भाषा विज्ञान तथा काव्यालोचन की पारस्परिक उपादेयता तथा सापेक्षता के द्योतक हैं। इस प्रकार इनके अतिरिक्त दैनिक प्रयोग में आने वाली अन्याय उपयोगी भाषा विषयक समस्याओं को भी प्रायोगिक अध्ययन पद्धति में सम्मिलित किया जा सकता है। कतिपय भाषा विज्ञानवेत्ता इसे प्रायोगिक भाषा विज्ञान अथवा व्यवहारिक भाषा विज्ञान के नाम से भी सम्बोधित करते हैं।

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