हिन्दी का भौगोलिक विस्तार बहुत दूर-दूर तक है। हिन्दी भारत देश के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में अपने भाविक स्वरूप के अन्तर्गत प्रयोग की जाती है। सीमावर्ती देशों के अतिरिक्त यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, मध्य एशिया आदि स्थानों पर भी हिन्दी का प्रभुत्व है। प्रमुख रूप से हिन्दी प्रदेशों में बोली जाने वाली हिन्दी का स्वरूप इस प्रकार है पूर्व में अवधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, मैथिली; पश्चिम में खड़ी बोली, हरियाणी या हरियाणवी, ब्रजभाषा, बुन्देली, राजस्थानी, कन्नौजी; उत्तर में कुमाऊँनी, गढ़वाली तथा दक्षिण में दक्खिनी आदि।

हिन्दी भारत के बहुसंख्यक लोगों की भाषा होने के साथ विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिन्दी ऐतिहासिक दृष्टि से युग युग की मध्यदेशीय भाषाओं संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि की उत्तराधिकारिणी है। वस्तुतः हिन्दी सम्पूर्ण देश में व्याप्त है। व्यवहार में यह राष्ट्रभाषा है, परन्तु राजनीतिक स्वार्थों के कारण कुछ राज्यों में इसे मान्यता नहीं मिल पाई। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि हिन्दी का क्षेत्र सम्पूर्ण भारत है।
पश्चिम में अम्बाला छावनी से लेकर पूर्व में पूर्णिया (बिहार व बंगाल के बीच की सीमा तक तथा उत्तर में बद्रीनाथ से लेकर खण्डवा (मध्य प्रदेश की दक्षिणी सीमा) तक हिन्दी बोली जाती है। इस विस्तृत क्षेत्र के अन्तर्गत बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखण्ड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान व मध्य प्रदेश सम्मिलित हैं। इस पूरे क्षेत्र को ही हिन्दी प्रदेश कहते हैं।
हिन्दी की उपभाषाएँ तथा उनकी बोलियाँ
हिन्दी के अन्तर्गत आने वाली पाँच उपभाषाएँ एवं उनकी बोलियाँ इस प्रकार हैं
उपभाषाएँ बोलियाँ बोलियाँ
- पश्चिमी हिन्दी : खड़ी बोली, हरियाणवी, ब्रजभाषा, बुन्देली, कन्नौजी
- पूर्वी हिन्दी : अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
- राजस्थानी हिन्दी : मारवाड़ी, जयपुरो ढूँढाड़ी, मेवाती, मालवी
- बिहारी हिन्दी : भोजपुरी, मैथिली, मगही
- पहाड़ी हिन्दी : गढ़वाली, कुमाऊँनी, नेपाली
खड़ी बोली
इस बोली को ‘हिन्दुस्तानी’, ‘सरहिन्दी’, ‘बोल-चाल की हिन्दुस्तानी खड़ी बोली’ आदि नाम दिए गए हैं। इसका दूसरा व सही नाम ‘कौरवी’ है। यह वही प्रदेश है, जिसे पहले कुरु जनपद कहते थे।
कौरवी या खड़ी बोली रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलन्दशहर, सहारनपुर, देहरादून के मैदानी भाग, अम्बाला (पूर्वी भाग) तथा पटियाला के पूर्वी भागों में बोली जाती है।
खडी बोली तथा उसके परिष्कृत रूप मानक हिन्दी में पर्याप्त समानताएं मिलती हैं।
14वीं शताब्दी में सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने इस बोली का प्रयोग किया। 16-17वीं शताब्दी तक हिन्दी साहित्य पर ब्रजभाषा व अवधी का आधिपत्य रहा, परन्तु कालान्तर में खड़ी बोली में हिन्दी साहित्य लिखा जाने लगा, न केवल पद्य में अपितु गद्य में भी खड़ी बोली का प्रयोग हुआ।
खडी बोली के विकास के साथ-साथ हिन्दी साहित्य में गद्य का भी जन्म हुआ। सदल मिश्र, लल्लू लाल, सदासुख लाल आदि ने अपने गद्य में खड़ी बोली का प्रयोग किया। अत: गद्य साहित्य के विविध रूपों में हिन्दी खड़ी बोली ने उल्लेखनीय विकास किया।
जयशंकर प्रसाद सूर्यकान्त ठा निराला, महादेवी वर्मा आदि कवियों ने अपने काव्य में खड़ी बोली का ही प्रयोग किया।
जयशकर प्रसाद रचित कामायनी खड़ी बोली का प्रसिद्ध महाकाव्य है।
खड़ी बोली में अतुकान्त पद्य में ‘निराला’ जी का प्रमुख स्थान है। खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य ‘हरिऔध’ रचित प्रिय प्रवास है।