द्विवेदी युग के काव्य की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए
खड़ी बोली काव्य का विकास-आधुनिक काव्यधारा का द्वितीय उत्थान आचार्य कविता. महावीर प्रसाद द्विवदी के नाम पर ‘द्विवेदी युग’ कहलाता है। आचार्य द्विवेदी जी के प्रादुर्भाव के साथ ही आधुनिक काव्य धारा में पुनः परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। यह परिवर्तन बड़ा हुआ। व्यापक था। इसका प्रभाव उस युग की काव्य वस्तु और शैली एवं भाषा दोनों पर ही पड़ा। करने का इस युग के काव्य पर द्विवेदी जी के व्यक्तित्व की इतनी गहरी छाप है कि इसे हम उन्हीं के नारी के नाम पर द्विवेदी युग कह सकते हैं राष्ट्रीय पद्य और गद्य-दोनों की वस्तु और शैली में परिवर्तन द्विवेदी युग में इस नवीन काव्यधारा का उद्रेक बड़े वेग से हुआ, जिसके फलस्वरूप ब्रजभाषा की पुरानी धारा सी हो गई। श्रृंगारकालीन काव्य परम्पराओं का ही लोप नहीं हुआ वरन् उनको अभिव्यक्त करने वाली ब्रजभाषा को काव्य के माध्यम के रूप में प्रायः सर्वथा त्याग दिया गया और उसके स्थान पर खड़ीबोली की प्रतिष्ठा हुई। काव्य-भाषा विषयक एक बड़ी समस्या सुलझ गई और खड़ी बोली काव्य भाषा के रूप में सर्वसम्मति से स्वीकार कर ली गई। श्रृंगारकालीन श्रृंगार की प्रवृत्ति को अश्लील मानकर उनका बहिष्कार किया गया। द्विवेदी जी के व्यापक प्रभाव से उनके समय की कविता में इतिवृत्तात्मकता की प्रधानता हो गई और उस युग का सम्पूर्ण काव्य अभिधा का उत्कृष्ट काव्य बनकर रह गया। उनमें लक्षणा का, चित्रमयता एवं अलंकारों का और व्यंजना का प्रायः अभाव हो गया। मातृभूमि प्रेम और स्वदेश गौरव, मानवतावादी तथा बुद्धिवादी प्रवृत्ति इस युग की कविता की प्राण बनी।
द्विवेदी युग के काव्य की प्रवृत्तियों पर प्रकाश
खड़ी बोली काव्य का विकास द्विवेदी युग में खड़ी बोली को काव्य क्षेत्र में पूर्ण प्रतिष्ठा न प्राप्त हुई। इसका श्रेय पण्डित श्रीधर पाठक (सन् 1859-1929) को है। उन्होंने ही सर्वप्रथम ने खड़ी बोली में सरस और सुन्दर काव्य रचना करके खड़ीबोली के एक सशक्त काव्य भाषा स, बनने की सम्भावना के द्वार खोल दिये। श्रीधर पाठक ने अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिथ पर के दो लघु प्रबन्ध काव्यों ‘हरमिट’ और ‘ट्रेवलर’ का क्रमशः ‘एकान्तवासी योगी’ और ‘श्रान्त इम पथिक’ शीर्षक से खड़ी बोली में अनुवाद करके खड़ी बोली की प्रबन्ध शैली की नींव डाली। चर उन्होंने खड़ीबोली में तीन प्रवृत्तियों को जन्म दिया स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति, प्रकृति प्रेम और के शोक गीत ये तीनों प्रवृत्तियाँ छायावादी कविता में विकसित हुई। इन्हीं के आधार पर पाठक जी
को छायावादी काव्य का जनक माना जाता है।
काव्य में राष्ट्रीय भावना का स्वर राजनीतिक चेतना द्विवेदी युग की काव्यधारा के विकास पर उस युग की राजनीतिक चेतना सामाजिक अवस्था और धार्मिक स्थिति का पूर्व प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। फिर भी इस युग के साहित्य में राजनीतिक चेतना स्वर अधिक मुखरित हुआ। इस युग की कविता राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है। उसने राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रमुख विषय बना लिया है। इस युग में कांग्रेस धीरे-धीरे प्रार्थना और नरम नीति छोड़ने मी लगी। देश की स्वतन्त्रता के लिए एक बड़ा राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ होने वाला था। इसीलिए से कांग्रेस मध्य वर्ग को साथ लेकर चलने लगी थी। उधर बंगभंग के पश्चात स्वदेशी आन्दोलन
का प्रसार हो रहा था। इटली के स्वतः इता 21 लस पान युद्ध और जापान की विजय आयरलैण्ड के होमरूल आन्दोलन इत्यादि घटनाओं ने भारतीय राजनीति में एक नवीन युगान्तर उपस्थित किया। इन परिवर्तनों का तत्कालीन काव्यधारा पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा। ‘देश प्रेम’
सायं कविता का प्रमुख विषय हो गया।
नारी के सम्बन्ध में परिवर्तित दृष्टिकोण द्विवेदी युग में सामाजिक क्षेत्र में भी परिवर्तन का स्थ सामाजिक उत्थान
डा। करने की भावना ने ले लिया और स्त्री शिक्षा इत्यादि आश्चर्यजनक वस्तु नहीं रह गई। साथ ही
नारी के रूप को भी महानता प्रदान की गई। अब वह भी पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
का प्रभाव बड़ा व्यापक पड़ा। वैसे तो आधुनिक काल के प्रारम्भ से ही हमें पुरातनता के प्रति एक विद्रोह सुनाई पड़ता है परन्तु द्विवेदी युग में बुद्धिवाद का बोलबाला है। इसीलिए इस युग के हिन्दी के धार्मिक काव्यों में अवतारवाद की भावना का विरोध दिखलाई पड़ता है। माईकेल मधुसूदन दत्त ने अपने ‘मेघनाथ-बध’ नामक महाकाव्य में अवतार के प्रति विद्रोह किया। इस बुद्धिवाद का द्विवेदी युगीन मानव जीवन पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। अब हम रूढ़िवादिता एवं गली सड़ी प्राचीन परम्पराओं को छोड़ रहे थे। इसीलिए दलित एवं निम्न वर्ग का भी उद्धार हो रहा था और रूढ़ि से दुष्ट माने जाने वाले पात्रों में भी नवीन मानवीय मूल्यों की स्थापना हो रही थी। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैज्ञानिक तार्किक दृष्टि से विचार करना प्रारम्भ कर दिया था इसलिए अलौकिक चरित्रों का वैज्ञानिक तार्किक कसौटी पर शुद्ध रूप न पाकर बहिष्कार हो रहा था। अलौकिक कृत्यों का भी मानवीकरण हो रहा था।
देश भक्ति एवं राष्ट्रीय जागरण का उद्दीप्त स्वर-
भारतन्दुयुगीन काव्यधारा की भाँति द्विवेदीयुगीन कविता की प्रधान भावना देश भक्ति की है। हाँ, इतना अन्तर है कि देश भक्ति की प्रवृत्तियों पर नवीन समय और नवीन कवियों की छाप पड़ी है। कवियों की नवीन मनोदृष्टि के अनुसार पुरानी प्रवृत्तियाँ कुछ-कुछ परिवर्तित हो गई हैं और यह परिवर्तन भी स्पष्ट लक्षित होता है। देश भक्ति के क्षेत्र में प्राचीन हिन्दू इतिहास तथा परम्परा का महत्व घट गया और कवियों का ध्यान अतीत से अधिक वर्तमान की ओर आकर्षित हुआ। साथ ही कांग्रेस मध्यवर्ग के हाथ में चली गई। इस युग के कवि समस्त जनता-विद्यार्थी, मजदूर, स्त्री पुरुष, बूढ़े-बच्चे सभी को देश की स्वतन्त्रता और समृद्धि के लिए आत्मबलि कर देने को प्रेरित करते हैं। क्योंकि भारत की उन्नति के लिए सभी जातियों का सच्चा मेल आवश्यक है। रामनरेश त्रिपाठी में एकता का विशेष आग्रह है। वे देशवासियों को द्वेष भाव छोड़कर देश की सर्वतोमुखी उन्नति लि करने के लिए प्रेरणा देते हैं और इस लक्ष्य की प्राप्ति में आत्मबलिदान करने का महत्व सिद्ध लि करते हैं। रूपनारायण पाण्डेय एक कविता में ईसाई, मुसलमान, पारसी, जैन, बौद्ध इत्यादि सभी द भारत देश में निवास करने वाली जातियों में भ्रातृत्व का विकास करने पर जोर देते हैं-
मानवतावादी विचारधारा-
द्विवेदी युग की काव्यधारा की दूसरी मुख्य विशेषता मानवतावादी विचारधारा है। रीतिकालीन हिन्दी कवियों का दृष्टिकोण बहुत ही संकीर्ण था, बर उनके लिए समस्त पुरुष नायक थे और त्रियाँ नायिकाएँ। भक्तिकाल में भी मानव व्यक्तित्व की साहित्य क्षेत्र में पूर्णाभिव्यक्ति धार्मिक वातावरण के कारण न हो सकी थी। किन्तु द्विवेदी युग में प्रथम बार मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखा गया और श्रृंगारिकता एवं धार्मिकता की संकीर्ण धारा में दीर्घकाल से वन्दिनी मानवता को मुक्त कराने का प्रयास किया गया। काव्य अब उच्चवर्गीय जीवनमात्र का प्रतिबिम्ब न होकर, निम्न वर्ग के जीवन का भी चित्रण करने है लगी। इस मानवतावादी विचारधारा के द्विवेदीयुगीन काव्य में तीन स्वरूप मिलते हैं- रत
(1) समानता की भावना – इसके अन्तर्गत स्त्री-पुरुष की समानता आती है।
(2) पीड़ित और दुखियों के प्रति सहानुभूति और
(3) मानवीय गुणों की सहज स्थापना द्वारा परम सत्य के स्वरूप की विवृत्ति
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