ब्रिटिश विजय

मुगल साम्राज्य का पतन

18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में महान मुगल शासन की शक्ति एवं प्रतिष्ठा का भारी पतन हुआ। साम्राज्य जिसने दो शताब्दियों से अधिक समय तक भारत के अधिकतर हिस्से पर नियंत्रण किया, उत्तर से दक्षिण लगभग 250 मील और 100 मील चौड़े समकोणीय पत्ती के आकार तक सिमट गया। साम्राज्य की न केवल राजनीतिक सीमा सिकुड़ी अपितु प्रशासनिक ढांचा भी ध्वस्त हो गया, जिसे स्वयं के अंतर्विरोधों के अंतर्गत अकबर एवं शाहजहां जैसे महान शासकों द्वारा परिश्रमपूर्वक निर्मित किया गया। साम्राज्य के ढहने पर, देश के विभिन्न हिस्सों में कई स्वतंत्र राजवंश उठ खड़े हुए।

औरंगजेब की गलत नीतियों ने मुगल साम्राज्य की स्थिरता को क्षीण किया। लेकिन सेना एवं प्रशासनिक व्यवस्था नामक दो स्तम्भ 1707 ई. तक सीधे खड़े रहे। उत्तराधिकार की लड़ाईयों और कमजोर शासकों ने 1707-1719 तक दिल्ली को त्रस्त एवं परेशान किया। यद्यपि मुहम्मद शाह ने 19 वर्षों की लम्बी समयावधि तक शासन किया, तथापि उसकी अक्षमता के कारण शाही भाग्य का पुनरुद्धार असंभव था। मुहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान निजाम-उल-मुल्म ने 1724 में वजीर के पद से इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्र हैदराबाद राज्य की स्थापना करने हेतु दक्कन चला गया। बंगाल, अवध और पंजाब ने भी इसी राह का अनुसरण किया और साम्राज्य उत्तराधिकारी राज्यों में विघटित हो गया। कई स्थानीय प्रमुखों ने अपनी स्वतंत्रता का दावा करना शुरू कर दिया और मराठों ने शाही दायित्व उत्तराधिकार में प्राप्त करने के प्रयास करने शुरू कर दिए। प्रयास करने शुरू कर दिए ।मुगल साम्राज्य

साम्राज्य की अक्षुण्णता में मुगलों के समक्ष चुनौतियां

उपर्युक्त आंतरिक कमजोरियों के अलावा, मुगल साम्राज्य को उत्तर-पश्चिम से विभिन्न आक्रमणों के रूप में बाहरी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। फारस के शासक,

नादिरशाह, ने 1738-39 में भारत पर हमला कर दिया तथा लाहौर को जीत लिया और 13 फरवरी, 1739 को करनाल में मुगल सेना को पराजित कर दिया। दिल्ली को ध्वस्त कर दिया गया जब आक्रमणकारी ने मुगल बादशाह, मुहम्मद शाह, को बंदी बना लिया और शहर मलबे में तब्दील हो गया। राजकीय खजाने और धनवान कुलीन लोगों की तिजोरियों से 70 करोड़ रुपए इकट्ठा किए गए। मयूर सिंहासन एवं कोहिनूर हीरा नादिर शाह की लूट की चीजों में दो बेहद कीमती चीजें थी। वह लूटी गई राशि एवं चीजों से बेहद खुश हुआ कि उसने फारसियों (फारस के नागरिकों को आगामी तीन वर्षों तक कर से छूट प्रदान कर दी। नादिर शाह ने काबुल सहित सिंधु नदी के पश्चिम का सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मुगल क्षेत्र भी हथिया लिया, जिसने भारत को उत्तर-पश्चिम की तरफ से होने वाले आक्रमणों के प्रति एक बार फिर कमजोर बना दिया। british vijay ke samay bharat ki sthiti kya thi

नादिर शाह के पश्चात, अहमद शाह अब्दाली ने अफगानिस्तान पर अपना शासन कायम किया और 1748 से 1767 के बीच कई बार उत्तरी भारत पर आक्रमण किया। उसने लगातार मुगलों को परेशान किया । 1757 में, जब अंग्रेजों ने प्लासी का युद्ध जीतकर बंगाल में कदम रखा, उसन दिल्ली पर आधिपत्य जमा लिया और मुगल बादशाह पर नजर रखने के लिए एक अफगान केयर टेकर को पीछे छोड़ गया। उसने 1761 में मराठाओं पर एक महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की जो इतिहास में ‘पानीपत का तीसरा युद्ध’ के नाम से सुप्रसिद्ध है।

मुगल साम्राज्य के विघटन के कारण

कुछ इतिहासकार विश्वास करते हैं कि 18वीं शताब्दी के मध्य में भारतीय अर्थव्यवस्था में तीव्र गिरावट के कारण मुगल साम्राज्य का पतन हुआ। यह सत्य है कि साम्राज्य के कई हिस्सों में अलग-अलग समय के लिए अराजकता एवं युद्ध हुए जिसने प्रतिकूल वित्तीय विपदा को जन्म दिया। केंद्रीय शासन ने अपनी शक्ति खो दी जिसने दिल्ली के पतन को प्रवृत्त किया। लोगों ने प्रांतों की ओर प्रस्थान कर लिया, बाजारों ने अपनी प्राथमिकता खो दी, कलाकारों ने आजीविका प्राप्ति के लिए अन्य स्थानों को गमन कर दिया। इसी प्रकार की स्थिति आगरा एवं अवध की थी। सिख विद्रोह ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया जिन्होंने लाहौर एवं अन्य स्थानों के व्यापारिक मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। सामान्य तौर पर, 18वीं शताब्दी के मध्य तक उत्तरी-पश्चिमी भारत के समृद्ध शहरी केंद्र अपक्षय की स्थिति में आ चुके थे। बंगाल, बिहार और उड़ीसा के पूर्वी प्रांतों में, मराठाओं के आकसिरक हमलों ने विनाशकारी युद्ध को बढ़ावा दिया। मुगल साम्राज्य

मुगल साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया

औरंगजेब के शासनकाल के दौरान शुरू हो चुकी थी, लेकिन इसमें तीव्रता 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् ही आई। यहां तक कि, परिस्थितियां इतनी भी शोचनीय या चिंताजनक नहीं थी कि प्रक्रिया को रोका नाजा सकता था।

यद्यपि कई प्रांतीय मुखियाओं और शासकों द्वारा मुगल सत्ता के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की गई, तथापि कोई भी मुगल शक्ति के समक्ष स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सका। सिख, मराठा और राजपूत इतनी क्षमता हासिल नहीं कर सके कि मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंक सकें। उन्होंने मुगल शक्ति का मात्र इतना विरोध किया जिससे वे अपने सम्बद्ध क्षेत्र में स्वतंत्रता हासिल कर सकें। इस प्रकार यदि औरंगजेब के उत्तराधिकारी सक्षम एवं योग्य शासक होते तो मुगल सत्ता का पतन नहीं होता। मध्यकालीन युग में, साम्राज्य का भविष्य शासक की क्षमताओं पर निर्भर होता था। औरंगजेब के उत्तराधिकारी, अक्षम, कमजोर एवं निर्लज्ज शासकों का समूह सिद्ध हुए जिसने विघटन की प्रक्रिया को तीव्र किया और अंततः इसे धूल-धूसरित करने में योगदान दिया। british vijay ke samay bharat ki sthiti kya thi

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