भाषाओं के पारिवारिक वर्गीकरण का आधार क्या है
भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण- सत्तरहवीं सदी से पूर्व तक भाषा शास्त्रियों ने कभी स्वप्न में भी यह नहीं सोचा था कि आरम्भ में अनेक मूल भाषाएँ रही होंगी और उन्हीं से विश्व की प्राचीन और आधुनिक ऐसी भाषाएँ विकसित हुई होंगी जिनमें परस्पर काफी समानता रही होगी। भारत की संस्कृत और यूरोप की ग्रीक और लैटिन काफी प्राचीन भाषाएँ हैं। जब सत्तरहवीं सदी में ग्रीक और लैटिन भाषाओं के यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत का अध्ययन किया तो उन्हें संस्कृत और लैटिन तथा ग्रीक में कुछ ऐसी समानताएँ मिलीं, जिनके आधार पर उन्होंने यह कल्पना की कि इन तीनों भाषाओं की उत्पत्ति किसी एक ही मूल भाषा से हुई होगी। इसी कल्पना के आधार पर संसार की विभिन्न भाषाओं और बोलियों की मूल भाषाओं की खोज आरम्भ हुई और भाषाओं के पारिवारिक वर्गीकरण का इतिहास बनना आरम्भ हो गया और इस इतिहास के साथ परिवारों की संख्या घटती-बढ़ती चली गई।
आरम्भ में धर्म-ग्रन्थों के आधार पर उन्हीं भाषाओं को संसार की मूल या आदि भाषा माना जाता था, जिन भाषाओं में ये धर्मय लिखे गये थे, परन्तु ऐसा मानना सर्वथा अवैज्ञानिक और अनैतिहासिक था। सन् 1822 में जर्मन विद्वान विल्हेल्म फॉन हम्बोल्ड्ट ने संसार के सम्पूर्ण भाषा परिवारों की संख्या 13 मानी। बाद में पार्टिरिज ने कुल 10 भाषा-परिवार माने। आधुनिक भाषा शास्त्रियों में से रीस एक ही परिवार मानते हैं और ग्रे 26। फ्रेडरिक, मूलर आदि जर्मन विद्वान संसार में लगभग 100 भाषा- परिवार मानते हैं। भारतीय विद्वान इनकी संख्या 10 से 18 तक मानते हैं। वस्तुतः अभी तक संसार की समस्त भाषाओं और बोलियों का पारिवारिक वर्गीकरण नहीं किया जा सका है। अभी तक अनेक ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें किन्हीं विशिष्ट भाषा परिवारों में स्थान नहीं मिल सका है, उदाहरणार्थ- सुमेरीय (मेसोपोटामिया), एलामीय (पश्चिमी ईरान), मितन्नी (पूर्वी मेसोपोटामिया), एत्रुस्कन (इटली), बुशमैन और हॉटनटॉट तथा जापान, आस्ट्रेलिया और कोरिया की कुछ भाषाएँ अभी तक किसी भी भाषा-परिवार में नहीं रखी जा सकती हैं। इसका कारण यह है
लिए आवश्यक सम्पर्क सामग्री अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी है। इसके अतिरिक्त अभी अनेक भाषाओं का भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हो सका है। इसीलिए अब तक किए गए भाषाओं के पारिवारिक वर्गीकरण को अन्तिम नहीं माना जा सकता। भाषा शास्त्रियों ने इस वर्गीकरण की सुविधा के लिए संसार की समस्त ज्ञात भाषाओं को भूगोल के आधार पर पहले चार भाषा खण्डों में विभाजित किया है- (1) अफ्रीका खण्ड, (2) यूरेशिया खण्ड, (3) प्रशान्त महासागरीय खण्ड, और (4) अमरीका खण्ड
उपर्युक्त भौगोलिक विभाजन के आधार पर मोटे रूप में, संसार की समस्त भाषाओं को निम्नलिखित चौदह भाषा-परिवारों में विभाजित कर दिया गया है
(1) भारोपिय, (2) सेमेटिक, (3) हैमेटिक, (4) यूराल-अल्ताइक, (5) चीनी या एकाक्षरी, (6) द्रविड़ (7) मलय-पौलिनीशियन, (8) बाटू, (9) बुशमैन, (10) सूडानी, (11) आस्ट्रेलियन पापुन, (12) रेड इंडियन अर्थात् अमेरिका की मूल भाषाएँ, (13) काकेशी, (14) जापानी-कोरियाई।
परन्तु कुछ विद्वान भाषा-परिवारों की संख्या केवल 12 मानते हैं। इसके विपरीत कुछ विद्वान मलय-पौलिनीशियन, आस्ट्रेलियन पापुन तथा जापानी-कोरियाई भाषा परिवारों को एक-एक भाषा परिवार न मान, दो-दो अलग-अलग भाषा परिवार मानते हैं। इन लोगों का कहना है कि ये भाषाएँ भिन्न-भिन्न भाषा-पा वारों से सम्बन्धित हैं। इसके विपरीत कुछ लोग सेमेटिक और हैमेटिक को अलग-अलग र मान एक ही भाषा परिवार मानते हैं। इसी कारण हम पीछे कह आए हैं कि भाषा-परिवारों के अभी तक किए गए वर्गीकरण को अभी अन्तिम नहीं माना जा सकता। अब उपयुक्त भाषाखण्डों के अनुसार उनका संक्षिप्त परिचय देने का प्रयत्न करेंगे। इस कहा जाता भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण क्या है वो
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