हिन्दी भाषा और उसका विकास/ Hindi Language and its Development

भाषा का अपना ही एक प्राचीन इतिहास रहा है। समय के साथ-साथ भाषा का रूप परिवर्तित होने से कालान्तर में अनेक भाषाओं, उपभाषाओं और बोलियों का विकास होता गया। हिन्दी भाषा ने भी अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त करने में काफी लम्बी समय-यात्रा की है।

संसार की प्रत्येक भाषा की एक सैद्धान्तिक व्यवस्था होती है। हिन्दी एक भारतीय आर्यभाषा है। ‘हिन्दी’ शब्द का मौलिक अर्थ है- हिन्द का अर्थात् भारतीय। भाषा के अर्थ में ‘हिन्दी’ का प्रयोग फारसियों और अरबों ने किया। पं. रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार, ‘ईरानी’ महाभारत काल से ही भारत को ‘हिन्द’ कहने लगे थे। अतः स्पष्ट है कि कालान्तर में ‘हिन्द’ देश के निवासियों को हिन्दुस्तानी और उनकी भाषा को ‘हिन्दी’ कहा जाने लगा।

विश्व की लगभग 3000 भाषाओं का मुख्यतः 12 भाषा परिवारों में विभाजित किया गया है भारोपीय (भारत-यूरोपीय), द्रविड़, चीनी, सैमेटिक, टैमेटिक, आग्ने, यूराल, बाँटू, रैड इण्डियन, काकेशस, सूडानी तथा बुशमैन। इन 12 भाषा परिवारों में भारोपीय समूह विश्व का अत्यन्त विस्तृत भाषा परिवार है। ‘हिन्दी’ इसी भाषा परिवार की भाषा है। इस भाषा परिवार की भारतीय शाखा को ही ‘भारतीय आर्य भाषा’ कहा जाता है।

भारतीय आर्य भाषाओं को तीन कालों में विभाजित किया गया है

1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई. पू. से 500 ई. पू. तक)

2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (500 ई. पू. से 1000 ई. पू. तक) 3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. पू. से अब तक)

(1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक)

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं को दो भागों वैदिक संस्कृत व लौकिक संस्कृत में वर्गीकृत किया गया है, जिनका विवरण इस प्रकार है

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक साहित्य में दृष्टिगोचर होता है। वैदिक संस्कृत को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-संहिता, ब्राह्मण एवं उपनिषद् ।

संहिता संहिता के अन्तर्गत चारों वेद आते हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद (शुक्ल और कृष्ण), सामवेद और अथर्ववेद।

ऋग्वेद संस्कृत का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसमें 10 मण्डल, 1028 सूक्त एवं 10580 ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद में देवताओं की स्तुतियों से सम्बन्धित श्लोक हैं।

यजुर्वेद कृष्ण एवं शुक्ल इन दो रूपों में सुरक्षित है। कृष्ण यजुर्वेद संहिता में मन्त्र भाग एवं गद्यमय व्याख्यात्मक भाग साथ-साथ संकलित किए गए हैं किन्तु शुक्ल यजुर्वेद संहिता में केवल मन्त्र भाग संगृहीत है।

सामवेद इसमें सोम यागों (यज्ञ) में वीणा के साथ गाए जाने वाले सूक्तों को गेय पदों के रूप में सजाया गया है।

– अथर्ववेद इसमें जन साधारण में प्रचलित मन्त्र तन्त्र, टोने-टोटकों का संकलन है।

लौकिक संस्कृत

पाणिनि की अष्टाध्यायी, रामायण, महाभारत, पुराण आदि की रचना लौकिक संस्कृत में ही हुई है। लौकिक संस्कृत में केवल 48 वर्ण रह गए। ळ, ळह, जिह्वामूलीय तथा उपमानीय के लुप्त हो जानें के कारण लौकिक संस्कृत में 48 ध्वनियाँ ही शेष रह गईं। लौकिक संस्कृत में वैदिक संस्कृत की अपेक्षा क्रिया रूपों और धातु रूपों में विशेष अन्तर आ गया है।

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