जनजातियों का आर्थिक आधार पर वर्गीकरण कीजिए
जनजातियों का आर्थिक आधार वे पारंपरिक साधन और गतिविधियाँ हैं जिनसे वे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहकर आजीविका चलाते हैं। जनजातियों का आर्थिक आधार पर वर्गीकरण कीजिए
भारतीय जनजातियों में विभिन्न प्रकार की अर्थव्यवस्थाएँ पायी जाती हैं। जनजातीय लोग जीविकोपार्जन के लिये कन्द, मूल, फल, शाक पात आदि का संकलन करते हैं; मछली मारते
हैं व शिकार करते हैं; दस्तकारी, पशुपालन एवं उद्योगों में कार्य करते हैं। कोई भी जनजाति किसी एक ही प्रकार की अर्थव्यवस्था के सहारे जीवित नहीं रहती वरन् थोड़े-बहुत सभी प्रकार के कार्य उनमें देखने को मिलते हैं। अतः हम भारतीय जनजातियों की अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था कह सकते हैं। संकलन करने वाले शिकार भी करते हैं और मछली भी मारते हैं तो पशुपालन करने वाले कृषि भी। कृषि करने वाले पशु-पालन के साथ-साथ दस्तकारी का कार्य भी करते हैं और उद्योगों में मजदूरों के रूप में भी कार्य करते हैं। इस प्रकार हम आजीविका कमाने की दृष्टि से किसी भी जनजाति को एक स्पष्ट श्रेणी में नहीं रख सकते। अध्ययन की दृष्टि से हम भारतीय आदिवासियों में पायी जाने वाली अर्थव्यवस्था वर्गीकरण प्रमुख रूप से
5 भागों में कर सकते हैं –
- संकलन करने वाली एवं शिकारी जनजातियाँ कई जनजातियाँ अपने जीवन- यापन के लिये वनों से कन्द-मूल, फल, शाक, सब्जी आदि एकत्रित करती हैं। स्त्रियाँ व बच्चे वनों में टोकरी लेकर निकल जाते हैं और उन्हें वहाँ फल-फूल, शाक-पात आदि जो कुछ भी मिलता है, ले आते हैं। कुछ लोग शहद, कत्था, महुआ, गोंद आदि का संकलन कर उन्हें बेचकर अपना जीवन-यापन करते हैं। ट्रावनकोर कोच्चि के कदार, माला पंडारम, पालीयन, पानीयन, कुरुम्बा; ओडिशा के बिरहोर, खड़िया, तमिलनाडु के चेंचू, उत्तर प्रदेश के राजी आदि इसी प्रकार की अर्थव्यवस्था अपनाये हुए हैं। जनजातियाँ महुआ के फल एवं पत्तों को खाते हैं और इससे शराब बनाते हैं। ये लोग जंगली आम, बड, पीपल, तेंद्र आदि से अपनी खाद्य सामग्री आंशिक रूप से प्राप्त करते हैं। इनमें से कई फल मीठे एवं स्वादिष्ट तो कुछ अरुचिकर, स्वादहीन एवं कड़वे होते हैं। दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त भविष्य के लिये भी वे संचय करते हैं, अधिक संकलन होने पर विनिमय एवं बिक्री भी करते हैं। ये लोग मधु, औषधियों, फलों और जड़ी-बूटियों का संकलन बिक्री के लिये ही करते हैं। कुदाल, बांस के टोकरे, हड्डियाँ और धनुष-बाण ही इनकी सम्पत्ति होती है। शिकार व मछली से भी ये लोग भोजन प्राप्त करते हैं। शिकार का कार्य धनुष-बाण से करते हैं। इन्हें फन्दों का भी पर्याप्त ज्ञान है। ये लोग पक्षी, खरगोश, हिरण एवं अन्य छोटे पशुओं का शिकार अकेले करते हैं परन्तु बड़े शिकार का आयोजन सामूहिक रूप से किया जाता है। संकलन एवं शिकार का एक निश्चित क्षेत्र होता है। संगीत खाद्य एवं शिकार को सभी लोगों में वितरित किया जाता है।
2. पशुपालक जनजातियाँ – जीविका पालन के लिये सम्पूर्ण रूप से पशुपालन पर आधारित जनजाति भारत में बहुत ही कम हैं। दक्षिण के नीलगिरि पर्वत की टोडा एवं हिमाचल प्रदेश के गुज्जर पशुपालन के द्वारा ही जीवन-यापन करते हैं। पशुपालन के लिये चारागाह की आवश्यकता होती है। अतः एक स्थान पर घास समाप्त हो जाने पर स्थान बदलना आवश्यक हो जाता है। इसलिये इनका जीवन घुमन्तु प्रकार का होता है। उदाहरण के लिये, हिमालय के गुज्जर सर्दियों में मैदानों में आ जाते हैं और गर्मियों में पशुओं को लेकर चम्बा की पहाड़ियों में चले जाते हैं। दूध बेचकर ही ये लोग अपना जीवन-यापन करते हैं। अब ये लोग थोड़ी-बहुत कृषि भी करने लगे हैं। उत्तराखण्ड में भोटिया जनजाति के लोग खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं। नीलगिरि के टोडा भैंसों का पालन करते हैं। इनमें भैंसे पवित्र मानी जाती है जिन्हें छूने की स्त्रियों को आज्ञा नहीं है। भैंसशाला को ये पवित्र स्थान और मन्दिर की तरह मानते हैं। वहाँ स्त्रियों को जाने की मनाही होती है। चूँकि इन लोगों की संस्कृति का आधार भैंस है, अत: इनकी संस्कृति ‘भैंस संस्कृति’ कहलाती है।
3. कृषि करने वाली जनजातियाँ कई जनजातियाँ कृषि द्वारा अपना जीवन-
यापन करतीहैं, परन्तु इसके साथ-साथ ये कन्द-मूल एवं फल एकत्रित करने, शिकार करने तथा पशुपालन का कार्य भी करती हैं। इनमें कृषि भी दो प्रकार से की जाती है। कुछ जनजातियाँ स्थानान्तरित खेती करती हैं तो कुछ स्थायी। स्थानान्तरित खेती को अलग-अलग नाम दिये गये हैं। नागा लोग इसे झूम मारिया इसे पेंडा, खोंड इसे पोडू, बैगा इसे बेवर तो कुछ इस डाहि या डाहिया कहते हैं। इस प्रकार की कृषि असम, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, ट्रावनकोर, कोच्चि एवं कोंकण तट की जनजातियों में पायी जाती हैं। इस प्रकार की कृषि में केवल मोटा अनाज जैसे जौ, चना, मटर, मक्का, बाजरा आदि ही उत्पन्न किया जा सकता है। इनमें फसल व भूमि दोनों की बर्बादी अधिक होती हैं
कमार व बैगा भूमि के एक छोटे भाग को चुन लेते हैं। गर्मियों में उस स्थान के वृक्षों को काट डालते हैं। वर्षा होने के कुछ सप्ताह पूर्व उन्हें जला देते हैं और राख बिखेर देते हैं। वर्षा के समय कुदाली से भूमि खोदकर बीज बो देते हैं। कई अन्य जनजातियाँ भी इसी प्रकार की खेती करती हैं। इस प्रकार की खेती से कुछ समय के लिये तो उपज ठीक होती है परन्तु थोड़ी अवधि बाद भूमि की उर्वरा शक्ति घटने लगती है। अतः उस भूमि को छोड़ दिया जाता है और दूसरे स्थानों पर फिर इसी विधि से खेती की जाती है। इसमें वनों का विनाश होता है और एवं भूमि में कटान बढ़ता जाता है। कई जनजातियाँ स्थायी रूप से एक ही स्थान पर खेती करती है। राजस्थान के भील, गोंड; तमिलनाडु के बडगा, कोट, इरूला, परजा; पश्चिम बंगाल के संथाल, असम के खासी, मणिपुरी; झारखण्ड के मुंडा, हो, उरांव; उत्तर प्रदेश के थारू, माझी और हिन्दू इसी प्रकार की कृषि करते हैं। आधुनिकता के सम्पर्क में आकर ये नवीन खाद, बीज एवं यन्त्रों का प्रयोग भी करने लगे हैं।
4. दस्तकारी करने वाली जनजातियाँ –
कई जनजातियाँ शिल्प उद्योग एवं दस्तकारी द्वारा जीवन-यापन करती हैं। वे वस्त्र निर्माण, टोकरी, चटाई, रस्सी, बर्तन एवं धातुओं की वस्तुएँ बनाने का कार्य करती हैं। कई कृषि करने वाली जनजातियाँ खाली समय में दस्तकारी का कार्य करती हैं
5. उद्योगों में लगी हुई जनजातियाँ –
औद्योगीकरण एवं मशीनीकरण ने समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित किया है। जनजातीय समुदाय भी इनके प्रभावों से मुक्त नहीं रहे हैं और आज अनेक जनजातियाँ अपना जीवन-यापन नौकरी करके या उद्योगों में श्रमिकों के रूप में कार्य करके कर रही हैं। इनमें से कई लोग वनों तथा गांवों को छोडकर नगरों में आ बसे हैं। कई जनजातीय लोग असम तथा दार्जिलिंग के चाय बागानों में कार्य कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के मैंगनीज उद्योगों में अनेक जनजातियाँ काम करती हैं। जमशेदपुर में लोहे के कारखाने और रानीगंज व झरिया की कोयला खदानों में अनेक संथाल हो तथा अन्य जनजातीय लोग लगे हुए हैं। इस प्रकार की जानकारी इस लिंक पर जुड़े Jaya Education Study
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