देवनागरी लिपि का स्थान निर्धारित करते हुए इसकी विशेषताओ
हिन्दी प्रदेश में कई लिपियाँ प्रयुक्त होती हैं-
1. महाजन, 2. बिहारी अथवा कैथी लिपि तथा 3. मैथिली लिपि । कैथी लिपि के तीन स्थानीय रूप मिलते हैं- (अ) तिरहुती कैथी लिपि, (ब) मगही कैथी लिपि तथा (स) भोजपुरी कैथी लिपि ।
प्रस्तुत लिपियों के अतिरिक्त उर्दू लिपि, सिन्धी एवं गुरुमुखी लिपि, बंगला लिपि, टाकरी, जालौनसारी कुल्लइ तथा रोमन लिपियाँ भी प्रयुक्त होती हैं।
महाजनी तथा बिहारी एवं (उनके उपभेद) लिपियों का विकास देवनागरी लिपि से ही
हुआ है। मैथिली लिपि बंगला के समीप है। परन्तु विद्वानों के मतानुसार उसका विकास प्राचीन नागरी के पूर्वी रूप से ही हुआ है।
उर्दू यथार्थतः अरबी फारसी, लिपि है, जो हिन्दी भाषा की उर्दू शैली की लिपि रूप में प्रयुक्त होती है।
सिन्धी और गुरुमुखी का प्रयोग भारत विभाजन के बाद शरणार्थियों द्वारा किया जाने लगा है। इसका प्रयोग बहुत ही सीमित है। इनकी उत्पत्ति ‘लंडा’ लिपि से हुई है।
बंगला लिपि का प्रयोग अत्यन्त सीमित रूप में कतिपय बंगाली परिवारों एवं संस्थाओं में होता है। वैसे यह लिपि भी पुरानी नागरी लिपि की पूर्वी शैली से उत्पन्न हुई है। टाकरी, जौनसारी तथा कुल्लुइ लिपियाँ अत्यधिक कठिन लिपियाँ हैं और इन सबका मूल आधार प्राचीन भारतीय लिपि ब्राह्म लिपि है। देवनागरी लिपि का प्रयोग व्यापक रूप में एवं विस्तृत क्षेत्र में होता है। अन्य लिपियों का प्रयोग अत्यन्त सीमित एवं स्थानीय रूप में ही होता है।
देवनागरी लिपि की श्रेष्ठता
लापया है और इन सबका मूल आधार प्राचीन भारतीय लिपि ब्राह्म लिपि है। देवनागरी लिपि का प्रयोग व्यापक रूप में एवं विस्तृत क्षेत्र में होता है। अन्य लिपियों का प्रयोग अत्यन्न सीमित एवं स्थानीय रूप में ही होता है।
भारत के अधिकांश ग्रन्थ, पत्र, पत्रिका समाचार पत्र आदि देवनागरी लिपि में ही प्रकाशित होते हैं। देवनागरी लिपि हमारी राष्ट्रीय लिपि के रूप में स्वीकृति प्राप्त है। उसकी लोकप्रियता का कारण उसकी वैज्ञानिकता तथा अन्य समस्त लिपियों की अपेक्षा उसकी श्रेष्ठता है-विद्वानों के मतानुसार देवनागरी लिपि संसार की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है तथा इसमें संसार की लगभग समस्त भाषाओं की ध्वनियों को उच्चरित करने की सामर्थ्य हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. यह एक व्यवस्थित रूप में निर्मित लिपि है। इसकी वर्णमाला में वर्ण क्रम अत्यन्त वैज्ञानिक रीति से रखा गया है।
2. इसमें ध्वनि प्रतीकों की सम्बद्धता व्यंजनों के वर्ग निर्धारित किये गये हैं तथा उसी क्रम में व्यवस्था की गयी है, जैसे-कण्ठय, तालब्ध, मूर्द्धन्य, दन्त्य और ओष्टय जैसे वर्गीकरण अत्यन्त वैज्ञानिक रीति पर किये गये हैं। इसीलिए इस वर्णमाला के द्वारा देवनागरी लिपि एवं हिन्दी भाषा सरलतापूर्वक सीखी जा सकती है।
3. ध्वनियों के दोनों रूप स्वर और व्यंजन में विभक्त हैं। रोग, अरबी, फारसी लिपियों में दोनों को मिला दिया गया है।
4. स्वरों के हस्व और दीर्घ का पृथक रूप है यथा अ, आ, इ, ई आदि। 5. अल्पप्राण एवं महाप्राण वर्णों के पृथक-पृथक चिन्ह हैं।
6. प्रत्येक में ध्वनि के लिये पृथक लिपि चिन्ह है, जो बोला जाता है वही लिखा जाता है इसमें अंग्रेजी उर्दू आदि की भाँति वर्तनी याद करने की आवश्यकता नहीं रहती है। अंग्रेजी में कट और पुट होता है। इसमें इस प्रकार की कोई कठिनाई नहीं है। इसी प्रकार इसमें केवल उच्चारित ध्वनियाँ ही लिखी जाती हैं। अनुच्चारित ध्वनियों को नहीं लिखा जाता है, में अनुच्चारित है।
7. उर्दू लिपि की तरह इसमें एक ही ध्वनि के लिए कई वर्ण नहीं है। जब तक शब्द की उत्पत्ति न हो, तब तक शुद्ध उर्दू लिखी हा नहीं जा सकती है। उर्दू में ‘स’ के लिए तीन वर्ण हैं-सीन से ‘स्वाद’ तथा ‘त’ के लिए दो संकेत हैं-ते तथा तोय । इसी प्रकार अंग्रेजी में ‘के’ के लिए दो चिन्ह प्रयुक्त होते हैं। कभी-कभी तो ‘क’ के लिए का भी प्रयोग होता है। फलत: इन लिपियों और भाषाओं को सीखने के लिए वर्तनी (हिज्जे ) का याद करना था रटना आवश्यक हो जाता है। हिज्जे का रटना अमनोवैज्ञानिक है। यह शिक्षाशास्त्र के सिद्धान्तों के प्रतिकूल पड़ता है तथा अधिक समय देना पड़ता है। इसके विपरीत नागरी और हिन्दी सीखने की प्रक्रिया वैज्ञानिक, सरल, रोचक, तीव्र गति वाली
रहती है।
8. देवनागरी लिपि में जो मात्राओं का नियम है, वैसा स्वर व्यंजक में योग उपस्थित करने वाला वैज्ञानिक नियम दुर्लभ है 53 1% के ए अरबी फारसी में जबर, जेर का विधान है। परन्तु इसका प्रयोग केवल प्रारम्भिक अवस्था में ही होता है। बाद में लोग
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