दिव्य परम गुरु करुणा सागर महाराज

सत कैवल्य साहेब

दिव्य परगुरु करुणा सागर महाराज कहा पर प्रगट हुवे थे

परमगुरु श्रीमत करुणा सागर महाराज का प्रकटीकरण: मान्यताओं के अनुसार, लगभग विक्रम सांवत १८२९ (सन.1772) 254+ वर्ष पहले, करुणा सागर परमगुरु ने गुजरात के आणंद जिले के कासोर गाँव के पास एक वन में एक दिव्य बालक के रूप में प्रगट हुवे थे

हैतबा की कथा: महाबीज के दिन परमगुरु ने हैतबा नामक की महिला को दर्शन दिए थे। हैतबा के बच्चे को एक लोमड़ी ने खा लिया था, और परमगुरु ने उस महिला को सांत्वना दी और उसके बच्चे के रूप में प्रकट हुए।

अनंत ब्रह्मांडाधीश कैवल कर्ता के वह दूत थे। प्रकट होते ही अपनी धर्म की माता को कैवल ज्ञान का उपदेश कर उन्होने ज्ञान सम्प्रदाय का सूत्रपात किया । परम ज्ञानी होते हुए भी गुरु-शिष्य परंपरा का मान रखते हुए उन्होने केवल ७ वर्ष की आयु में गृह त्याग कर उस समय के सिद्ध योगी श्री कृष्णस्वामी महाराज के पास साधु दीक्षा लेकर कुवेरस्वामी नाम धारण किया ।

ज्ञान संप्रदाय गुरु गादी में महाबीज क्यो मनाया जाता है (दिव्य परगुरु करुणा सागर महाराज कहा पर प्रगट हुवे थे)

महाबीज  जिसे ‘महा सुद बीज’ भी कहा जाता है, परमगुरु के प्रकटीकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन संपदारा के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र है और आमतौर पर पोष सुद बीज (हिन्दू कैलेंडर के अनुसार) को मनाया जाता है, जो जनवरी फरवरी के आसपास आता है। महाबीज से संबंधित मुख्य बातेः

इस लिए महाबीज के रूप में हर वर्ष

उत्सवः इस दिन विशेष पूजा, सत्संग, समूह भक्ति, और सेवा के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

अखंड कैवल्य धुनः महाबीज के अवसर पर 75 घंटे की अखंड कैवल्य धुन (Akhand Kaival Dhun) का भी आयोजन किया जाता है।

ज्ञान का प्रसारः यह दिन कर्ता (परमेश्वर) के ज्ञान का प्रसार करने और भक्तों को कैवल्य मार्ग पर ले जाने के लिए मनाया जाता है। Telegram group link = https://t.me/educationsuchanadekho26

यह कार्यक्रम कैवल्य ज्ञान पीठ, सारसा (Sarsa) और दुनिया भर के कैवल जान मंदिरों में जगद्‌गुरु श्री अविचलदेवाचार्य महाराजजी के मार्गदर्शन में मनाया जाता है

और दिव्य परगुरु करुणा सागर में इस प्रथ्वी पर 105 साल तक रहा और ज्ञान संप्रदाय का प्रचार किया और यह हिन्दू धर्मं के आते है दिव्या परम गुरु करुणा सागर महाराज पूरी मानवता को सही और साचो मार्ग पर चले और पूरी मानवता का कल्यियाण हो  इस लिए जम्बूदीप आये थे    

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