मध्यप्रदेश में राष्ट्रवाद के उदय की विवेचना
राष्ट्रवाद से आशय यह है कि लोग अपने इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता या संस्कृति के आधार पर एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इन सीमाओं के कारण उन्हें लगता है कि उन्हें अपने फैसलों के आधार पर अपना संयुक्त राजनीतिक समुदाय, ‘राष्ट्र’ बनाने का अधिकार है।
लगभग 1600 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना के साथ ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी। प्रारंभ में अंग्रेज व्यापारी बनकर भारत आए थे, किंतु धीरे-धीरे उन्होंने भारत को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से कमजोर कर अपना उपनिवेश बना लिया। मध्यप्रदेश भी इस प्रभुत्व से बच न सका। मध्य प्रदेश पर अधिकार कर इस संपूर्ण क्षेत्र का आर्थिक दोहन किया। अंग्रेजों की इसी साम्राज्यवादी नीति के परिणामस्वरूप भारतीयों में राष्ट्रवादी भावना का विकास हुआ जो समय-समय पर अनेक विद्रोहों के रूप में हमें देखने को मिलती है। मध्य प्रदेश भी इसमें पीछे नहीं रहा।
वे समस्त कारण, जिनसे संपूर्ण भारत में राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ था, वे कारण मध्य प्रदेश में भी क्रियाशील थे। फिर चाहे वे राजनीतिक कारण हो या यातायात के साधनों का विकास हो या विदेशी व पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव हो या धार्मिक, सामाजिक आंदोलन व पुनर्जागरण या अंग्रेजों की शोषणकारी नीति हो।
राजनीतिक एकता के लाने में तथा उसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता के विकास में यातायात तथा आवागमन के साधनों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। यातायात व आवागमन के नवीन द्रुतगामी साधन, जैसे- रेल, सड़क, मोटर, बस, डाक, तार, सड़कें आदि ने भारतीयों को परस्पर संपर्क में आने-जाने और विचार-विमर्श करने के अधिकाधिक अवसर प्रदान किये। देश के विभिन्न भागों के नेता परस्पर मिल-जुलकर राष्ट्रीय कार्य करने में समर्थ हो सके तथा विभिन्न प्रांतों की जनता से भी उनका संपर्क स्थापित हो सका।
ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय यूरोपीय, अमेरिका तथा जापानी लोगों के संपर्क में आयें। वे उनके स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र के विचारों, प्रणालियों तथा प्रगति के कार्यों से प्रभावित हुए। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात भारतीयों का यह संपर्क और भी अधिक बढ़ गया। इससे लोकतंत्र की विचारधाराओं और राष्ट्रीय भावनाओं को बल मिला।
भारत में अंग्रेजी शिक्षा और अंग्रेजी भाषा का प्रसार अभिशाप के साथ-साथ एक वरदान के रूप में भी सिद्ध हुआ। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग को परस्पर विचार विनिमय और संपर्क के अवसर प्राप्त हुए। अनेक भारतीय शिक्षा प्राप्ति के लिए इंग्लैंड, यूरोप तथा अमेरिका गये। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से, पाश्चात्य साहित्य के माध्यम से, पश्चिमी देशों के संपर्क से भारतीयों ने वहाँ के जनवादी स्वतंत्रतापरक विचारों को तथा, इटली की राष्ट्रीयता, अमेरिका के स्वतंत्रता, युद्ध तथा फ्रांस व रूस की राज्यक्रांति के विचारों और आंदोलनों को समझा। मैजिनी, बर्क, रूसों, वाल्टेयर, मिल, स्पेसर आदि की रचनाओं का गहन अध्ययन किया। व्यक्तिगत स्वाधीनता, राष्ट्रीयता, उदारवाद आदि से वे प्रभावित हुए। पाश्चात्य देशों के स्वतंत्र वातावरण तथा विभिन्न मानव अधिकारों से भी वे अधिक प्रभावित हुए। इससे भारतीयों को नूतन प्रकाश मिला। वे समझ गये कि अंग्रेज शासक प्रजा के लिए हैं, प्रजा उनके लिये नहीं। उनमें उदारता, राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता की भावनाएँ उत्पन्न हुई।
उन्नीसवीं सदी में राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज, स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन और स्वामी विवेकानंद, थियोफिकल सोसायटी और एनीबेसेन्ट तथा अन्य धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं ने भारतीयों में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना उत्पन्न की। इन्होंने भारतीयों को उनके गौरवपूर्ण अतीत व श्रेष्ठतम सभ्यता को समझाया, गरिमामय महान निधियों का ज्ञान कराया, देश और संस्कृति के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा व प्रेम उत्पन्न करवाया। आर्य समाज ने भारतीय धर्म, संस्कृति, स्वदेशी वस्तुओं तथा देश से प्रेम करने की भावना का संचार किया। कुछ पाश्चात्य विद्वानों, जैसे- मैक्समूलर, विलियम जोन्स, चार्ल्स विल्किन्स, हावेल, फरग्युसन आदि ने अपने ग्रंथों में भारतीय सभ्यता, संस्कृति धर्म और ललित कलाओं की मुक्तकंठ से प्रशंसा की और यह प्रदर्शित किया कि भारतीय धर्म, संस्कृति और कला श्रेष्ठतर है। इससे भी भारतीयों में उनके धर्म, सभ्यता, साहित्य, देश आदि के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा उत्पन्न हो गयी। जब वे अपने इस अतीत के गौरवपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन की तुलना आधुनिक ब्रिटिश काल के जीवन से करने लगे तो उनको भारत दरिद्र, पराधीन, शोषित, अशिक्षित और उपेक्षित प्रतीत हुआ। फलत: इन धार्मिक और सामाजिक आंदोलनों से भारतीयों के हृदय में अपनी वर्तमान दासता और दुरवस्था से मुक्ति पाने का
अदम्य उत्साह और तीव्र लालसा उत्पन्न हो गयी
इस समय भारतीय साहित्य में रचित उपन्यासों, कविताओं, नाटकों तथा अन्य ग्रंथों में राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावनाएँ भरी हुई थीं। बंकिमचंद्र के उपन्यास आनंद मठ ने देश को वंदेमातरम गीत दिया। ‘नील दर्पण’ नामक बंगाली नाटक में यूरोपियों, अधिकतर नील के बगीचों में श्रमिकों के शोषण और अत्याचार का दिग्दर्शन है। ऐसी साहित्यक रचनाओं ने राष्ट्रीयता की बेगवती धारा को शक्ति प्रदान की। मध्यप्रदेश में राष्ट्रवाद के उदय की विवेचना
अंग्रेजी कंपनी की सरकार ने अपने व्यापारिक हित में भारतीय उद्योग-व्यवसायों को नष्ट कर दिया और भारतीय व्यापार पर एकाधिकार कर लिया। इससे बेकारी व भुखमरी अधिक फैल गयी। भारत का अधिकांश कच्चा माल इंग्लैंड जाने और आर्थिक कठिनाइयाँ निरंतर बढ़ती गयी। इसके अतिरिक्त अंग्रेज सरकार की अत्यन्त व्ययशील शासन प्रणाली और भारत के
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अंग्रेज शासक स्वयं को भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे। उनके साथ अशिष्ट और दुर्व्यवहार करते थे। वे भारतीय श्रमिकों को कठोर दंड देकर कभी-कभी उनकी हत्या भी कर देते थे। भारतीयों को ‘अर्द्धनियो’, ‘अर्द्धगोरिला’, ‘अर्द्धकाला’ आदि कहते थे। अनेक अंग्रेज अधिकारियों का व्यवहार गाली-गलौच से भरा होता था। इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति घृणा के भाव जागृत हो गये। सरकारी नौकरियों में भी भारतीयों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जाने लगा। इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षाएँ केवल लंदन में ही आयोजित की जाती थीं और इनमें बैठने वालों की आयु सीमा 21 वर्ष से 19 वर्ष कर दी गयी। इस नीति से भारतीयों को आई सी एस परीक्षा में बैठना असंभव हो गया।