हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद

हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद के साहित्यकारों की रचनाओं का उल्लेख

प्रगतिवाद का प्रारम्भ छायावादी कवियों ने ही किया, यह इसकी आवश्यकता एवं

स्वाभाविक विकास के सत्य को पूर्णतया प्रमाणित कर देता है। प्रगतिवाद जीवन के प्रति एक स्वस्थ एवं सामयिक दृष्टिकोण है। इसमें जनता की उस आशा, आकांक्षा एवं कर्मच्छा की अभिव्यंजना हुई है, जो देश, समाज और मनुष्य को आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं बौद्धिक दासता से मुक्त होने की प्रेरणा देती है। छायावाद की प्रेम सौंदर्य की भाव-व्यंजना प्रगतिशील भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त सिद्ध न हुई। छायावादी ‘छन्द-बन्ध’ भी इस प्रगतिशील भावसरिता को अपने कूलों में बाँधने में समर्थ न हुआ, अतः मुक्त छन्द की अवतारणा हुई जिसमें मुक्त भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रवाहपूर्ण धारा में हुई। निराला जी के शब्दों में ‘वह कविता की स्त्री सुकुमारता के विरुद्ध कवित्व का पुरुष गर्व है। प्रगतिशील यथार्थवाद के लिए मुक्त छन्द अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध हुआ।’ पंत जी ने ‘युगान्त’ में छायावाद का अन्त करते हुए ‘युगवाणी’ में जनवादी विचारधारा को अपनाया। ग्राम्या में प्रगतिवादी मान्यताओं का व्यापक प्रयोग है। प्रगतिवाद का आलम्बन जनजीवन है और भारत में जन-जीवन का केन्द्र है ग्राम। पंत जी की ‘ग्राम्या’ में ग्राम के समग्र रूप की झाँकी मिलती है। किसानों और मजदूरों, धोबियों और ग्रामवधू की ग्राम्य प्रकृति और ग्राम्य नर-नारी के प्रति बौद्धिक सहानुभूति भी है। धीरे-धीरे पंत फिर पुराने आदर्शवाद में खो गए हैं।

दूसरे छायावादी कवि निराला नई भाषा, भाव और शैली को लेकर आए। इन्होंने निम्न वर्ग को अपनी कविता का साध्य बनाया और उनकी दीन स्थिति के निर्माताओं पर कद व्यंग्य किये। ‘भिक्षुक’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘डिप्टी साहब आए’, ‘कुत्ता भौंकने लगा’, आदि व्यंगों में निराला ने पूँजीवाद की भर्त्सना की। किन्तु इन सभी कविताओं में कवि का अहं झलकता है, सामाजिक दर्शन नहीं। यह था आरम्भिक प्रगतिवाद जो छायावादी कवियों के काव्य में अवतरित हुआ। ‘अंचल’ की कविताओं में भी इसी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। उनकी आरम्भिक रचनाओं में यौवनगत प्रेम, पिपासा और रूप लालसा विद्यमान हैं, जिनमें सौंदर्यान्वेषण ही प्रधान है। उन्होंने वैयक्तिक भावनाओं को भी महत्व दिया है। धीरे-धीरे प्रगतिवाद अपनी व्यक्तिवादी, प्राकृतिकतावादी, आदर्शवादी (पंत में कहीं-कहीं अध्यात्मवाद की झलक मिलती है) प्रवृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ सामाजिक दर्शन को अपना रहा है और अपने प्रकृत स्वरूप जनवादी धारा को प्रकट कर

केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, डॉ. रांगेय राघव, डॉ. रामविलास शर्मा, भवानी प्रसाद मिश्र, चन्द्रकुँवर वस्वलि, भैरवप्रसाद गुप्त, डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन, डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया,

त्रिलोचन, अमृतराय, राजेना यादव, डॉ. महेन्द्र भटनागर प्रभृति कवियों ने इस स्वस्थ प्रगतिवादी (जनवादी) विचारधारा के अपनी कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। ये कवि अधि कांशत: मध्य वर्ग से निकल कर आए हैं।(हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद के साहित्यकारों की रचनाओं का उल्लेख)

केदारनाथ अग्रवाल- केदारनाथ अग्रवाल हिन्दी के प्रौढ़ सहदय और भावुक कवि है। ‘नीव के बादल’ कवि की प्राथमिक रचनाओं का संग्रह है जिसमें प्रेम और सौंदर्य, प्रकृति वर्णन, छायावाद एवं रहस्याद तथा यथार्थवादी रचनाएँ संकलित हैं। ‘युग की गंगा’ नामक संग्रह में प्रकृति सम्बन्धी, यथार्थवादी रचनाएँ तथा जनगीत हैं। जनगीत या सामूहिक गीत बड़े ओजपूर्ण हैं। इस संग्रह की भूमिका में कवि ने लिखा है- “अब हिन्दी की कविता न ‘रस’ की प्यासी है, न ‘अलंकार’ की इच्छुक है, और न ‘संगीत की तुकान्त’ की भूखी है।”

नीरज प्रगतिवादी कवियों में नीरज का महत्वपूर्ण स्थान है। वे उन कवियों में हैं जो सच्चे अर्थों में प्रगतिशील एवं मानव कल्याण में विश्वास रखते हैं। उनका साम्यवाद की ओर झुकाव नहीं है। मानव के यथार्थ जीवन की वेदना का निरूपण करके उसके मंगल की कामना करते है। वे बच्चन युग के गीतकार हैं किन्तु बच्चन से एकदम भिन्ना ‘निशा निमन्त्रण’ आदि में नीरज के गीतों का परिवेश मानव जीवन के सुख-दुःख हैं। उनके पन्द्रह गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। नीरज अद्यतन हिन्दी कवियों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया-कविवर सिसौदिया 1944 से ही प्रगतिवादी कविता के क्षेत्र में विख्यात हैं। उनका प्रथम कविता संग्रह ‘बंगाल के प्रति और अन्य कविताएँ’ 1946 ई. में छपा। उनके काव्य में उत्पीड़ित, दलित, दमित और शोषित मानव की मुक्ति के लिए विप्लवी हुँकार मिलती है और मिलते हैं अपराजेय, पौरुष, अदम्य उत्साह, अकुण्ठ आशावाद और अटूट संकल्प। उनकी भाषा शैली एक आर जहाँ जनवादी है, वहाँ दूसरी ओर वह साहित्यिकता के उच्चतम शिखरों का स्पर्श करती है। उनका भाव जगत समृद्ध और विस्तृत है। डॉ. सिसौदिया ने प्रगतिशील कविता के क्षेत्र में सुली और शान्ति’ शीर्षक प्रबन्धात्मक खण्डकाव्य प्रस्तुत किया है। यह काव्य पाकिस्तान के काश्मीर पर हुए आक्रमण से सम्बन्धित है। इसमें शान्ति के लिए युद्ध लड़ने का तर्क बहुत ही सुन्दर है। इस काव्य में वीररस के उपयुक्त ओजपूर्ण पदावली है। कविवर सिसौदिया का 25 वर्ष की कविताओं का एक संकलन ‘दीवारी के पार’ प्रकाशित हुआ है। इसमें जीवन और संघर्ष, ध्वंस और सृजन, प्रकृति और प्रेम, मानवतावादी धरातल पर अनेकमुखी भंगिमाओं में चित्रित है।

नागार्जुन-नागार्जुन समाज तथा देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ एवं जागरूक कवि हैं। हिन्दी कविता में सर्वहारा वर्ग के संघर्ष की आवाज बुलन्द करने वालों में नागार्जुन अग्रगण्य हैं। मजदूर वर्ग के संघर्ष को उन्होंने प्रेरणा दी। देश की असहाय अवस्था से उनका हृदय पीड़ित हो उठा। उनकी कविता में जनता का संघर्ष मूर्तिमान है। गाँधी जी की हत्या से भावाकुल कवि की छटपटाहट में युग का यथार्थ रूप झलक रहा है। नेताओं के बदले हुए स्वर से कवि को बड़ी चोट पहुँचती है। उन्होंने जनभाषा को अपनाया। उपमाओं को चुनने में भी जनभावनाओं को प्रमुखता प्रदान की। महँगाई कैसे बढ़ी है, जैसे द्रोपदी की साड़ी हो । व्यंग तो नागार्जुन की कविता की सबसे बड़ी विशेषता है। किन्तु इस व्यंग के पीछे निरीह जनता की, आँसू बहाती हुई जनता की वेदना है।

कवि धरती की पीड़ा से व्याकुल है। वह उसे हरा-भरा कर देने के हित में ‘गल गल जाऊँ मिट मिट जाऊँ’ की भावना रखता है। उसे संसार से, उसके प्राणियों से, प्रकृति से प्यार है। जीवन की शक्ति पर असीमित विश्वास है ‘यदि मौत नहीं रुकती तो जन्म भी कहाँ रुकता है।’ प्रेम के साथ ही श्रम को भी उसने महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कवि का भावपक्ष अत्यन्त सबल है। उनकी काव्य चेतना भारतीय जनता की चेतना है। Telegram group link = https://t.me/educationsuchanadekho26

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