पर्यावरण
प्रत्येक जीव का अपना एक विशिष्ट परिवेश होता है, जिसके साथ वह लगातार पारस्परिक क्रिया करता रहता है, जिसमें वह अपना जीवन निर्वाह करता है और जिसके प्रति वह पूरी तरह से अनुकूलित रहता है। दूसरे शब्दों में, पर्यावरण भौतिक, जैविक तथा रासायनिक दशाओं का योग है, जो पृथ्वी पर विद्यमान जीवन के सभी स्वरूपों को प्रभावित करता है। समग्र रूप में देखें, तो पर्यावरण जीवित पदार्थों के चारों ओर फैला वह स्थान है, जिसके साथ उनका सहजीवी संबंध होता है।
यह मूलतः एक बहुशास्त्रीय दृष्टिकोण है, जो हमारे प्राकृतिक जगत और मानव पर उसके प्रभाव को समग्रता में समझना सिखाता है। हमारे पर्यावरण में दैनिक जीवन के लिए आवश्यक अनेक प्रकार की वस्तुएँ और खनिज शामिल हैं और साथ में जलवायु एवं सौर ऊर्जा भी। ये प्रकृति के अजैविक घटक हैं, जबकि प्रकृति के जैविक घटकों में सूक्ष्म जीवाणुओं समेत
विभिन्न जीवों के समुदायों के रूप में ही जीवित रह सकते हैं, जो अपने आवास में आपस में घनिष्ठ संबंध रखते हैं और जिन्हें विशेष अजैव दशाओं की आवश्यकता होती है।
प्रकृति के अजैव पक्षों और विशिष्ट जीवों की आपसी अभिक्रिया से ही विभिन्न प्रकार के पारितंत्रों (इकोसिस्टम) का निर्माण होता है। इनमें से अनेक सजीवों का उपयोग हमारे खाद्य संसाधनों के रूप में होता है।
पर्यावरण शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के शब्द से हुई है जिसका अर्थ है घिरा हुआ। अंतरसरकारी संगठन ओईसीडी (OECD) के अनुसार पर्यावरण से तात्पर्य एक जीव के जीवन विकास और अस्तित्व को प्रभावित करने वाली सभी बाहरी स्थितियों की समग्रता से है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार, पर्यावरण हमारे चारों तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाओं और उनके साथ अंतः क्रियाओं का समुच्चय है।
मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की घोषणा के अनुसार “पर्यावरण वायु, भूमि एवं जल का मिश्रण है जो विशेष रूप से प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है।”
पर्यावरण के घटक
पर्यावरण एक जटिल तंत्र है जिसमें जीव-जन्तुओं के विकास हेतु आवश्यक दशाएं उपलब्ध होती हैं। हालांकि, पर्यावरण एक व्यापक स्वरूप को ग्रहण किए हुए है, फिर भी विभिन्न घटकों के आधार पर इसे निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है:-
स्थलमंडल (Lithosphere)
यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है जिसे स्थलमंडल अथवा भूपृष्ठ कहते हैं। स्थलमंडल का निर्माण विभिन्न चट्टानों अथवा पदार्थों से हुआ है। भूपर्पटी के नीचे
मेंटल है जो पृथ्वी के लगभग 29% भाग पर फैला हुआ है। स्थलमंडल पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। इस पर विभिन्न जलवायविक विसंगतियों के चलते अलग-अलग स्थलाकृतियों तथा पर्यावरणीय प्रदेशों का सृजन हुआ है। इन पर्यावरण प्रदेशों (मरुस्थल, शीतमरुस्थल, वर्षावन तथा तटीय प्रदेश) में विभिन्न स्थानिक वनस्पतियों तथा जीव-जन्तुओं का विकास होता है। स्मरणीय है कि भूपटी में ही विवर्तनिक प्लेटें पाई जाती हैं।
पर्यावरणीय घटक के रूप में जलमंडल का विशेष महत्त्व है। पृथ्वी पर पाये जाने वाले जलीय भाग को जलमंडल के अन्तर्गत शामिल किया जाता है। इसमें महासागर, सागर, झीलें, तालाब, नदियाँ आदि सम्मिलित हैं। जलमंडल पृथ्वी के 71% भाग पर विस्तृत रूप में फैला हुआ है। जलमंडल में विभिन्न आकार तथा रंग की वनस्पतियों एवं जीव-जन्तुओं के आश्रय व विकास हेतु अनुकूल दशाएं हैं। पृथ्वी पर समस्त जल का 97.5% जल खारा है और केवल 2.5% जल पीने योग्य है । ताजे पानी का लगभग 30% भौम जल के रूप में तथा 68.5% हिमनदों के रूप में मिलता है। नदियों, जलाशयों व झीलों में समस्त ताजे जल का केवल 6.3% पाया जाता है। इन जलाशयों में अनेक प्रकार के जीवों के विकास हेतु अनुकूल पर्यावरणीय दशाएं विद्यमान हैं।
वायुमंडल (Atmosphere) (महात्मा गाँधी का जीवन परिचय)
वायुमंडल गैसों का वह आवरण है जिसने पृथ्वी को चारों ओर से घेरा हुआ है। सौरमंडल के अब तक ज्ञात ग्रहों मेंपृथ्वी ही ऐसा ग्रह हैजिस पर वायुमंडल उपस्थित है । वायुमंडल की
उपस्थिति पृथ्वी पर जीवन के उदविकास हेतु अनुकूल वातावरण निर्मित करती है। वायुमंडल जैव व अजैव कारकों के लिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वायुमंडल को संरचना व संघटन जीवों व वनस्पतियों को संपूर्ण क्रियाओं को प्रभावित करता है।
वायुमंडल के संघटन में नाइट्रोजन (78.08%), ऑक्सीजन (20. 95%), ऑर्गन (0.93%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.03%) तथा अति अल्पमात्रा में हाइड्रोजन, हीलियम, ओजोन, मीथेन, क्रिप्टॉन, जेनॉन आदि हैं। वायुमंडल में बड़ी मात्रा में जलवाष्प तथा तथा धूल कण भी मौजूद हैं वायुमंडल में उपस्थित गैसें, पौधों के प्रकाश संश्लेषण, ग्रीनहाउस प्रभाव तथा जीव व वनस्पतियों को जीवित रखने के लिए आवश्यक स्रोत हैं।
वायुमंडल का
वायुमंडल कई आवरणों अथवा परतों से बना है, ऊँचाई के साथ-साथ वायुमंडल के तापमान और दाब दोनों में परिवर्तन होता है, इस परिवर्तन के आधार पर हमें वायुमंडल की निम्नलिखित पाँच परतो का पता चलता है-
क्षोभमंडल (Troposphere)
धुवों पर यह 8 कि.मी. तथा विषुवत् रेखा पर 18 कि.मी. की ऊँचाई तक पाया जाता है। इस मंडल में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1°C तापमान घटता है, इसी परत में आर्द्रता, जलकण, धूलकण वायुधुंध तथा सभी मौसमी घटनाएँ होती हैं। यह पृथ्वी की वायु का सबसे घना भाग है और पूरे वायुमंडल के द्रव्यमान का 90% हिस्सा इसी में मौजूद है।
क्षोभ सीमा (Tropopause)
क्षोभमंडल और समताप मंडल को अलग करने वाले 1.5 कि.मी. मोटे संक्रमण को ट्रोपोपॉज या क्षोभ सीमा कहा जाता है। इसमें ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान का गिरना बन्द हो जाता है।