भाषा के सहज स्वभाव एवं नैसर्गिक गुण को भाषा की प्रकृति कहते हैं। भाषा का गहन सम्बन्ध समाज से है, वह समाज में रहकर ही मानव को प्राप्त होती है। वह किसी की पैतृक सम्पत्ति नहीं है, उसे मानव अनुकरण से प्राप्त करता है एवं अर्जित करता है। भाषा सदैव परिवर्तित होती रहती है, वह किसी के बंधन में विकसित नहीं होती, अपितु उसका प्रवाह नैसर्गिक एवं प्राकृतिक होता है और वह परंपरागत भी होती है। इस प्रकार भाषा के विविध स्वरूप एवं प्रकृति को सुगमता की दृष्टि से निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है
1. भाषा सामाजिक वस्तु है- भाषा की उत्पत्ति समाज में होती है, उसका विकास भी समाज में होता है और समाज द्वारा न अपनाये जाने पर उसी समाज में समाधिस्थ भी हो जाती है। कहा जा सकता है भाषा समाज की है, समाज के लिये है समाज के द्वारा है। भाषा का प्रयोग भी सामाजिक ही है। एकान्तवासी योगी के लिये भाषा को कोई विशेष उपयोग नहीं होता है। भाषा का अस्तित्व तो एक से बहुत होने की इच्छा से सम्बद्ध है।
2. भाषा अभिव्यक्ति का मौखिक साधन है–कहने की आवश्यकता नहीं कि मानव जागने से सोने पर्यन्त जितने भी क्रिया कलाप सम्पादित करता है, उनमें अस्सी प्रतिशत के लगभग मौखिक अभिव्यक्ति का उपयोग करता है, शेष में आवश्यकता पड़ने पर लिखित का। इतना ही नहीं आहार, निद्रा, भय, मैथुन जैसी अपरिहार्य भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में विश्व का प्रत्येक प्राणी मौखिक अभिव्यक्ति ही अपनाता है और अभिव्यक्ति का एक मात्र सक्षम एवं सुकर साधन भाषा ही है। अत: भाषा का मौखिक अभिव्यक्ति में महत्व निर्विवाद है। भाषा की प्रकृति स्वरूप की विवेचना एवं विशेषताए
3. भाषा का प्रवाह अनवरत चलता है- छन्दस से वैदिक संस्कृत, वैदिक संस्कृत से लौकिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं, उपभाषाओं, बोलियों, उपबोलियों का उत्तरोत्तर विकास ही पर्याप्त प्रमाण है कि भाषा का प्रवाह अविच्छिन्न रहता है, अनवरत चलता रहता है, अवरुद्ध है, अविराम है। शैक्सपीरियन इंग्लिश, मिल्टोनिक इंग्लिश और बीसवीं सदी की इंग्लिश जैसे सम्बोधन भी भाषा की अबाध प्रगति के द्योतक हैं।
4. भाषा अर्जित वस्तु है-भाषा जन्म से प्राप्त वस्तु नहीं है। यह अर्जित वस्तु है, जिसका अर्जन प्रत्येक प्राणी अपने सामाजिक पर्यावरण में करता है। प्रयत्न करने पर व्यक्ति एकाधिक भाषाओं पर अपना अधिकार कर लेता है, यह सर्व स्वीकृत तथ्य है। इस तथ्य की स्वीकारोक्ति से यह सिद्ध होता है कि भाषा मानव की अर्जित सम्पत्ति है। भाषा की प्रकृति स्वरूप की विवेचना एवं विशेषताए
5. भाषा व्यवहार द्वारा अर्जित वस्तु है- भाषा के विषय में केवल इतना ही कहना पर्याप्त नहीं कि भाषा मानव की अर्जित सम्पत्ति है, अपितु यह भी एक स्वयं सिद्ध सत्य है कि भाषा व्यवहारार्जित है। कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा व्यवहारज है, प्रयत्नज है, अभ्यासजनित है और प्रत्येक प्रयत्नशील प्राणी अनवरत अभ्यास के द्वारा भाषा सीख सकता है।
6. भाषा का अर्जन समाज सापेक्ष है-भाषा अर्जित सम्पत्ति है, प्रयत्नज तथा अभ्यासावलम्बित है, परन्तु यह भाषा अर्जन समाज सापेक्ष है, समाज में ही सम्भव है, समाज संवलित है, समाज सम्पोषित है । समाज के अभाव में भाषा सीखने की कल्पना करना आकाश में फूल खिलाना है, रेगिस्तान में उद्यान लगाना है, जल में महल बनाना है। मनुष्य जिस समाज के संसर्ग में कुछ समय के लिये रहता है, उस समाज की भाषा अनायास हो सी