इन्दिरा गांधी की विदेश-नीति का स्वरूप
शास्त्री जी की मृत्यु के बाद भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी बनी। इन्दिराजी ने नेहरुजी की विदेश-नीति को व्यावहारिक बनाने के लिए कूटनीतिक उपायों का प्रयोग किया।
इन्दिरा गांधी ने चीनी परमाणु परीक्षण (1964) के मध्येनजर भारत को भी परमाण शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने की कवायद तेज कर दी। 18 मई, 1974 को पोकरण नामक स्थान पर भारत ने प्रथम परमाणु परीक्षण किया और भारत को महान राष्ट्र बना दिया। इसके साथ ही इन्दिरा गांधी ने पड़ोसी देशों के साथ मधुर सम्बन्ध स्थापित किए। उन्होंने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को नई दिशा दी। इसी दौरान उन्होंने हिन्द महासागर को हमेशा के लिए शान्ति का क्षेत्र घोषित कराकर विश्व शान्ति की दिशा में महान कदम बढ़ाया। इन्दिरा गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वाधिक महत्व दिया। उसके बाद 24 मार्च, 1977 को मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमन्त्री बने। उन्होंने अमेरिका तथा रूस के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास किए और स्वतन्त्र विदेश-नीति के संचालन का संकल्प लिया। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ भी मधुर सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास किए। 1980 में दोबारा श्रीमती इन्दरा गांधी भारत की प्रधानमन्त्री बनी। इस दौरान भारत- पाक सम्बन्धों में कटुता आई। उन्होंने एक दूसर पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरु कर दिये। 1981 में भारत ने चीन के साथ सम्बन्ध सुधारने के लिए सांस्कृतिक समझौता किया। इस काल में भारत-अमेरिका सम्बन्धों को सुधारने की कवायद भी की गई, लेकिन अमेरिका द्वारा पाक को दी जाने वाली आर्थिक व सैनिक सहायता ने दोनों के सम्बन्धों में खट्टास पैदा कर दी। 1981 में श्रीलंका से औद्योगिक समझौता भी हुआ और 1982 में भारत के राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी स्वयं वहाँ गए। लेकिन फिर भी भारत-श्रीलंका के बीच तमिल समस्या पर गंभीर मतभेद उपजे। इस दौरान भारत ने रूस के साथ सम्बन्धों को अधिक मजबूत बनाया। 1984 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की मृत्यु हो गई और इस तरह भारत की विदेश-नीति को यथार्थवादी बनाने की कवायद रुक गई।