वास्को डिगामा ने भारत

नाविक हेनरी कहा जाता है, के काम को इसी संदर्भ में

वास्को डिगामा भारत के रास्ते की करते हुआ भारत कब आया था केसे आया था

देखा जाना चाहिए। 1418 के बाद प्रिंस हेनरी अफ्रीका के पश्चिमी तट की खोज के लिए हर साल दो या तीन जहाज भेजा करता था, और भारत के समुद्रमार्ग की तलाश के लिए भी। उसके दो उद्देश्य थे। पहला, समृद्ध पूर्वी व्यापार से तुकों को और अपने यूरोपीय प्रतियोगियों को बाहर करना, खासकर वेनिस वालों को। दूसरा, अफ्रीका और एशिया के “हब्शियों” को ईसाइयत के दायरे में लाकर तुर्कों और अरबों की बढ़ती ताकत का सामना करना। इन दोनों उद्देश्यों के लिए प्रयास बराबर जारी रहे। वास्तव में, वे एक दूसरे को औचित्य प्रदान करते और बल पहुँचाते थे। 1453 में पोप ने इसे एक “बुल” (धर्मादेश) जारी करके अपना समर्थन दिया जिसमें उसने पुर्तगाल को अफ्रीका में स्थित केप नोर से भारत तक “खोजी गई” तमाम भूमियों को “हमेशा के लिए ” इस शर्त पर दे दिया कि इन देशों की जनता को ईसाइयत के दायरे में लाया जाएगा।

1488 में बार्थोलोम्यू दियाज़ ने केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाया तथा यूरोप और भारत के बीच सीधे व्यापार संबंध का आधार डाल दिया। ऐसी लंबी समुद्री यात्राएँ अनेक उल्लेखनीय आविष्कारों के कारण संभव हुईं, मुख्यतः कंपस और एस्ट्रोलैब के कारण, जिसका प्रयोग यात्रा के दौरान आकाशीय पिंडों की ऊँचाई जानने के लिए किया जाता था। इनमें से कोई भी यूरोपीय आविष्कार न था। नाविकों का कंपस (दिशासूचक यंत्र) चीनियों को अनेक सदी पहले से ज्ञात था. पर इसका अधिक उपयोग नहीं किया गया था। लेकिन अरब, भारतीय और दूसरे लोग एस्ट्रोलैब का व्यापक उपयोग कर रहे थे। यह एक यूनानी आविष्कार था पर अरबों ने इसमें भारी सुधार किया था। यूरोपीय जहाज उन दिनों एशियाई समुद्रों में चल रहे जहाज़ों, जैसे चीनी जंक से श्रेष्ठ नहीं थे। यूरोपवालों का साहस और उद्यम की भावना निश्चित ही नई बात थी। इस भावना को तेरहवीं सदी से ही व्यापार और वाणिज्य के पुनरुत्थान और उद्यम से जोड़ा गया है, जिसके कारण यूरोपीय राज्यों के बीच तीखी शत्रुता पैदा हुई थी। उतनी ही महत्त्वपूर्ण वह नई बौद्धिक उथल-पुथल थी, जिसे पुनर्जागरण कहते हैं। पुनर्जागरण धर्मग्रंथों या चर्च को बुद्धिमत्ता का आधार बनाने के बजाए स्वतंत्र अन्वेषण की भावना का सूचक था। इन विकासक्रमों के कारण बारूद, छपाई, दूरबीन आदि अन्य विदेशी (अरब और चीनी) आविष्कारों को भी तेजी से आत्मसात किया गया फैलाया और सुधारा गया। धातुकर्म के विकास के कारण बेहतर किस्म की बंदूकें बनने लगीं।

अपने जहाज पर गुजराती चालक साथ लेकर वास्को-द-गामा 1498 में कालीकट पहुँचा। वहाँ बसे अरब सौदागरों के शक्तिशाली समूह ने उसका विरोध किया, पर जमोरिन ने, जो एक हिंदू राजा था, पुर्तगालियों का स्वागत किया तथा उन्हें काली मिर्च, जड़ी-बूटियाँ आदि अपने साथ ले जाने की अनुमति दे दी। पुर्तगाल में गामा की लाई वस्तुओं की कीमत पूरे अभियान की लागत की 60 गुनी आँकी गई। इसके बावजूद भारत और यूरोप के बीच सीधा व्यापार धीमे ही बढ़ा। इसका एक कारण पुर्तगाल सरकार का एकाधिकार था। आरंभ से ही पुर्तगाली शासक पूर्वी व्यापार से न सिर्फ़ यूरोप और एशिया के प्रतियोगी राष्ट्रों को बल्कि निजी पुर्तगाली व्यापारियों को भी बाहर रखकर उसे शाही एकाधिकार बनाने के लिए कमर कसे हुए थे।

पुर्तगालियों की बढ़ती शक्ति

 चौकन्ना होकर मिस्र के सुल्तान ने एक बेड़ा तैयार किया और उसे भारत की ओर भेजा। उससे गुजरात के शासक के भेजे जहाजों का एक समूह आ मिला। आरंभ में इसे जीत मिली और पुर्तगाली सूबेदार दोन अलमाइदा का बेटा मारा गया। पर इसके बाद 1509 में पुर्तगालियों ने इस संयुक्त बेड़े को मात दे दी। फिर तो पुर्तगाली नौसेना हिंद महासागर में सबसे बड़ी शक्ति बन गई और उसके कारण पुर्तगालियों ने अपनी गतिविधियों को फ़ारस की खाड़ी और लाल सागर तक फैला लिया। दिया।

गोवा को आधार बनाकर

पुर्तगालियों ने कोलंबो (श्रीलंका), आचिन (सुमात्रा) और मलक्का बंदरगाह पर किले बनाए तथा अपनी स्थिति को और मजबूत किया। मलक्का तो मलाया प्रायद्वीप की तंग समुद्री पट्टी में आने-जाने पर नियंत्रण रखता था। पुर्तगालियों ने लाल सागर के मुहाने पर सोकोतरा द्वीप में एक अड्डा भी बनाया। किंतु वे अदन पर कब्जा करने में नाकाम रहे और लाल सागर उनके नियंत्रण से बाहर रहा। पर उन्होंने फारस की खाड़ी में प्रवेश को नियंत्रित करने वाले होर्मुज के शासक को मजबूर करके वहाँ एक किला बनाने की अनुमति ले ली। वास्कोडिगामा भारत कब आया था

पुर्तगालियों की सफलता वास्तविकता से अधिक दिखावटी

 आरंभ से ही उनको आंतरिक और बाह्या, दोनों प्रकार की अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बाहरी चुनौती तो तुक की थी, जिनसे कभी-कभी अरब और कुछ भारतीय शक्तियाँ भी हाथ मिला लेती थीं। सीरिया, मिस्र और अरब को जीतने के बाद तुकों ने पूर्वी यूरोप को जीतना आरंभ कर दिया था और 1529 में केंद्रीय यूरोप की राजधानी और उसकी सुरक्षा के द्वार वियना के लिए खतरा बन चुके थे। लाल सागर और फ़ारस की खाड़ी के तट पर तुर्क शक्ति के उदय से अनुमान होता था कि हिंद महासागर के पश्चिमी भाग पर वर्चस्व के लिए तुकों और पुर्तगालियों के बीच एक टकराव होगा। 1541 के एक खत में उस्मानी वजीर-ए-आजम लुत्फ़ी पाशा ने तुर्क

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सुल्तान सुलेमान को लिखा था, ‘पिछले सुल्तानों के काल में ज़मीन पर हुकूमत

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