बुंदेलखण्ड क्षेत्र की रियासते
छतरपुर, ओरछा आदि में भी 1930 के दशक में जन आंदोलन होते रहे। छतरपुर में 1930 से लगान आंदोलन चल रहा था। 14 जनवरी 1931 को इस संबंध में आयोजित सभा पर सेना ने गोली चालन किया, जिसमें 21 लोग मारे गए तथा 21 गिरफ्तार हुए। इस निर्मम गोलीकाण्ड से पूरे बुंदेलखण्ड में असंतोष फैल गया। 1938 में छतरपुर में सेटलमेंट के विरुद्ध पुनः आंदोलन हुआ। ओरछा में 1937 में नारायणदास खरे के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन के लिए आंदोलन हुआ। 1938 में बुंदेलखण्ड स्टेट कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ, जिसमें छतरपुर तथा ओरछा को शामिल किया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन से पूर्व झाबुभा रियासत की एक घटना का उल्लेख जरूरी है। 17 जून, 1941 को झाबुआ के आबकारी एवं चुंगी अधीक्षक तथा राज्य पुलिस ने भील किसानों के एक जत्थे पर बिना पूर्व सूचना के गोली चालन कर दिया। ये आदिवासी किसान झाबुआ से इंदौर रियासत स्थित बमनिया मंडी में अपने उत्पाद बेचने जा रहे थे। गोलीचालन के फलस्वरूप तीन लोगों की मृत्यु हो गई तथा 40 घायल हुए। झाबुआ की प्रजा-परिषद् के सचिव के.बी. मेनन ने द्वारकानाथ काचरू को झाबुआ रवाना किया, जिन्होंने उक्त घटना की जाँच की। यह जाँच रिपोर्ट समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई, जिससे झाबुआ नरेश पर दबाव पड़ा और उसने झाबुआ के किसानों को बमनिया मंडी से अपने उत्पाद बेचने पर लगाया प्रतिबंध हटा दिया। बुंदेलखण्ड क्षेत्र की रियासते
जिस समय 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ ब्रिटिश क्षेत्रों के साथ-साथ ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्रों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। मध्यप्रदेश से सम्बद्ध अनेक रियासतोंमें कांग्रेस कमेटियाँ कार्यरत थी। इतना ही नहीं कांग्रेस ने फरवरी, 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में रियासतों में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन को पूर्ण समर्थन देने का निर्णय लिया था। 1939 में लुधियाना में हुए भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की अध्यक्षता करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने रियासतों में चल रहे आंदोलनों को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के साथ जोड़ने की आवश्यकता प्रतिपादित की। स्पष्ट है कि रियासतों में कार्यरत प्रजा परिषदें तथा प्रजामंडल कांग्रेस के साथ सम्बद्ध हो रही थी।
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