खड़ीबोली का परिचय

खड़ीबोली का परिचय देते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

खड़ीबोली का परिचय

आधुनिक काव्य में साहित्य, शासन तथा शिक्षा आदि के क्षेत्र में अभिव्यक्ति का माध्यम खड़ी बोली बन गई है। इस शब्द का प्रयोग आज सामान्यतः दो अर्थों में मिलता है-

(1) मेरठ के आस-पास बोली जाने वाली ब्रज भाषा और

(2) हिन्दी उर्दू के शब्दों से युक्त होने पर हिन्दुस्तानी, संस्कृत के शब्दों से युक्त होने पर हिन्दी एवं अरबी फारसी के शब्दों से युक्त होने पर उर्दू कहलाने वाली भाषा। साहित्य में प्रायः यह दूसरा अर्थ ही ग्रहण किया जाता है।नामकरण हिन्दी की कई अन्य बोलियों के नामों के समान ‘खड़ी बोली’ नाम बहुत पुराना नहीं है। इस नाम के प्रथम प्रयोगकर्ताओं में लल्लूलाल, गिलक्राइस्ट तथा सदल मिश्रा का नाम लिया जाता है। आगे चलकर यह नाम प्रचलित हो गया। इसके नामकरण के सम्बन्ध में निम्न मत प्रचलित हैं–

(1) लल्लूलाल सदल मिश्र के साक्ष्य के साक्ष्य से खड़ी बोली का अर्थ खरी अथवा विशुद्ध अर्थात् अरबी फारसी शब्दों से सर्वथा रहित भाषा है।

(2) डॉ. भोलानाथ तिवारी-तिवारी जी ने प्रथम मत को ही सर्वाधिक ग्राह्य स्वीकार किया है।

(3) ब्रजरत्नदास के अनुसार – “लल्लूलाल ने गिरी पड़ी रेख्ते की बोली से यावनी शब्दावली निकालकर जिस भाषा में ‘प्रेमसागर’ लिखा, उसे रेख्ते अर्थात् मिश्रित या गिरी पड़ी बोली के वजन पर ‘खड़ी बोली’ नाम दे दिया जो नाम उनके बाद चल पडा।”

(4) कामता प्रसाद गुरु के अनुसार – “ब्रजभाषा के ओकारान्त रूपों से मिलान करने पर हिन्दी आकारान्त रूप खड़े जान पड़ते हैं। बुन्देलखण्ड में इस भाषा को ठाड़ी बोली या तुर्की कहते हैं।”

(5) चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के अनुसार पुरानी कविता जो मिलती है वह ब्रजभाषा या पूर्वी वैसबाड़ी, अवधी, राजस्थानी, और गुजराती आदि में मिलती है-अर्थात् पड़ी बोली में पाई जाती हैं। मेरठ ने पड़ी बाली को खड़ी बनाकर लश्कर (सेना) और समान के लिए उपयोगी बनाया।” डॉ. चटर्जी भी इसी मत के समर्थक हैं।

(6) किशोरी दास बाजपेयी के अनुसार – “इस खड़ी पाई (1) के कारण इसका नाम खड़ी बोली बहुत ही सार्थक है।” जैसे-ब्रज मीठी, अवधी मीठी खड़ी बोली-मीठा।

(7) जॉन गिलक्राइस्ट तथा डॉ. विश्वनाथ प्रसाद के अनुसार खड़ी बोली का अर्थ टकसाली अर्थात् स्टैण्डर्ड भाषा है।(8) डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार – “ब्रजभाषा की अपेक्षा यह बोली वास्तव में खड़ी (कर्कश) लगती है। कदाचित इसी कारण इसका नाम खड़ी बोली पड़ा।”

(9) टी. ग्राह्य वेली के अनुसार, अर्थात् 18 खड़ी शोली अवस्थित एवं प्रचलित भाषा

खड़ीबोली का परिचय देते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

(10) अब्दुल हक के अनुसार खड़ी बोली के माने हिन्दुसतान में आम तौर पर गवारू बोली के हैं। जिसे हिन्दुस्तान का बच्चा-बच्चा जानता है। टी. ग्राह्म बेली ने इस मत का बड़ी तीव्रता से खण्डन किया है।”नामकरण के आधार खडी बोली के नामकरण के समान ही उसके आधार के सम्बन्ध में भी मतभेद हैं। इस सम्बन्ध में भी निम्न मत हैं-(क) प्रो. बीम्स, डॉ. ग्रियर्सन, डॉ. चटर्जी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ श्याम सुन्दर दास अभि इसे कौरवों पर आधारित भाषा मानते हैं।(ख) इस्टविक इसे ब्रज पर आधारित मानते हैं।(ग) एच. टी. कोलनुक इसे कन्नौजी पर आधारित मानते हैं।(घ) डॉ. मसरूद हसन खाँ इसे बांगरू पर आधारित मानते हैं।(ङ) अन्य कुछ विद्वान पंजाबी पर आधारित मानते हैं।(च) डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार “वस्तुतः खड़ी बोली पूर्वी पंजाबी, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बोलियों के मिश्रण का एक परिनिष्ठित रूप है।”खड़ी बोली का नामकरण नई कविता, नई भाषा से खड़ी बोली के लिए भारतेन्द हरिश्चन्द्र, राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द तथा जार्ज ग्रियर्सन आदि द्वारा नई भाषा शब्द के प्रयोग को देखकर कुछ लोग इसे कृत्रिम तथा अविष्कृत भाषा मानते हैं। वस्तुतः तथ्य यह है कि ‘खड़ी बोली’ नाम अवश्य नया था परन्तु भाषा नई नहीं थी। डॉ. ग्रियर्सन के शब्दों में “जब प्रेम सागर लिखा गया तो हिन्दुओं ने समझा कि अरे, यह तो वही गद्य की भाषा है जिसे वे बिना जाने जीवन भर बोलते रहे हैं।”खड़ी बोली का विकास खड़ी बोली का जन्म 1000 ई. के आस-पास माना जाता है। इसके विकास के तीन काल हैं-(1) आदिकाल-खड़ी बोली का आदिकालीन रूप गोरखनाथ, खुसरो, रामानन्द आदि की कविता में दिखाई देता है।विशेषतायें (क) ध्वनि की दृष्टि से उल्लेखनीय है कि इस काल में अपभ्रंश के तुलना में दो नई ध्वनियाँ ऐ, ओ, आ गई। रूप की दृष्टि से अपभ्रंश के तथा कालान्तर में विकसित शब्द साथ-साथ चल रहे हैं। जैसे भरिया भरया भरा, चलिया चाल्या चला। (ख) व्याकरणीय दृष्टि से इस काल की शब्दावली मुख्यतः तद्भव और देशज थी तत्सम शब्द अपेक्षाकृत कम थे, कतिपय विदेशी शब्द भी आ गए थे।(2) मध्यकाल खड़ी बोली के मध्य काल का स्वरूप कबीर, नानक, रैदास, रहीमआदि भक्त कवियों में तथा गंग की ‘चन्दछन्द वर्णन की महिमा’ में दिखाई देता है। विशेषताएँ (1) ध्वनि विकास की दृष्टि से इस काल में अक्षरान्त ‘अ’ प्रायः लत हो गया, राम का उच्चारण रण राम् होने लगा। शिक्षित वर्ग में क, ख, ग, ज, फ जैसी नई ध्वनियों का प्रयोग होने लगा। अधिकांशतः रूपों की दृष्टि से खड़ी बोली अपभ्रंश के प्रभाव से मुक्त हो गई थी किन्तु अपवाद रूप कुछ पुराने-इन्हें, इम्हारा, करता, चल्या जैसे प्राचीन रूप भी चल रहे थे।(2) व्याकरणीय दृष्टि से संयुक्त क्रियाओं का प्रचलन अभी नहीं हुआ था ‘कि’ की सहायता से वाक्य बनने लगे थे। शब्दावली में विदेशी शब्द भी काफी आ गए थे और धार्मिक जागरूकता के कारण तत्सम शब्दों के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ गई थी। (3) आधुनिक काल-आधुनिक काल में खड़ी बोली की विशेष उन्नति हुई। प्रेस,समाचार पत्र, विज्ञान आदि के प्रचार ने इसके विकास में भारी योगदान दिया। 19वीं शताब्दी तक खड़ी बोली केवल गद्य की भाषा थी, किन्तु अब धीरे-धीरे उसका पद्म पर भी एकाधिकार हो गया। लल्लूलाल की रचना मध्यकाल एवं आधुनिक काल के सन्धि स्थल पर थी।विशेषताएँ आज के प्रयोग में आने वाली सभी ध्वनियों सभी स्वरों के अनुनासिक रूप ने, की, ताई, से, का, के, की में आदि। परसर्ग मुझ मुझी’, तुम्हें तुम्हें, उन बिहने (उन्हें) उनने (उसने) बिन्होने (उन्होंने) आदि सर्वनाम, करोड़ करोड़ सौ से आदि संख्या वाचक शब्द, जद, तद, फर, सोही (सामने आदि अव्यय, ल्याना, बरसावना, लिवैया, पढ़के, जानू, कहे है, लगा चिघाड़ने, आदि क्रिया रूप मिलते हैं। इनमें स्पष्ट है कि उस काल की खड़ी बोली में एकरूपता का अभाव था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने काल में खड़ी बोली को नियमित एवं परिनिष्ठित रूप देने में बहुत बड़ा योग दिया।खड़ी बोली रूप की दृष्टि से आज आत्म निर्भर है। इसमें प्रयुक्त संस्कृत रूप ‘कृपया ‘ स्वतः आदि अपवाद रूप ही है। नई प्रवृत्तियों का समागम आज कुछ नई प्रवृत्तियाँ भी आने लगी हैं। उदाहरणार्थ-मेरेको, मेरे से, मेरे पर, आदि प्रयोग तथा ‘हम जा रही है’ के स्थान पर ‘हम जा रही है’ के स्थान पर ‘हम जा रहे है। पुल्लिंग प्रयोग और मैं जाता हूँ के स्थान पर हम जाते हैं। बहुवचन प्रयोग की प्रवृत्ति घर करती जा रही है।ध्वनि की दृष्टि से एक नई ध्वनि ” (डॉक्टर) आ गई है। आदिकाल में आए ऐ-औ संयुक्त स्वर पुनः लुप्त हो गए हैं। अब इसके स्थान पर अर्ध विकृत स्वरों का प्रयोग होने लगा है।आधुनिक खड़ी बोली की शब्दावली में तत्सम शब्दों की प्रधानता है, इसका कारण सांस्कृतिक उत्थान है। गद्य में भी संस्कृत निष्ठता आ गई है। प्रगतिवादी युग में सरलता की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा और अब आंचलिक शब्दों का प्रयोग भी होने लगा है। पारिभाषिक शब्दों की पूर्ति के लिए विदेशी शब्दों का प्रयोग भल्ले से होने लगा है। आज इस भाषा के शिक्षा, प्रकाशन, साहित्य, समाचार पत्र, विज्ञान, वाणिज्य, तथा विधि का माध्यम बन जाने से इसकी सम्पन्नता एवं क्षमता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। खड़ी बोली के रूप साहित्यिक दृष्टि से खड़ी बोली के पाँच विभिन्न रूप हैं। हिन्दी, उर्दू, रेख्ता, अथवा रेख्ती, हिन्दुस्तानी तथा दक्खिनी ।

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